भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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बोधिसत्व प्रात काल का भोजन कर राजद्वार गया। वही छत्तपाणी को देख हाथ से पकड पूछा-मित्र, क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ? "तुझे किसने कहा है कि मै चारो अङ्गो से युक्त हूँ ?" "देवराज शक्र ने।" "किस कारण से कहा ?" "इस कारण से ' कह सब कहा। वह बोला-हाँ, मैं चारो अङ्गो से युक्त हूँ। बोधिसत्व उसे हाथ से पकडे ही पकडे राजा के पास ले जाकर बोला- महाराज, यह छत्तपाणी चारो अङ्गो से युक्त है। उद्यानपाल की आवश्यकता होने पर इसे उद्यानपाल बनावें। राजा ने उसे पूछा-क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ? हां महाराज। 'किन चारो अङ्गो से ?" उत्तर दिया- "अनुसुय्यको अह देव अमज्जपायको अहं, निस्नेहको अह देव अक्कोधन अधिद्वितो ॥ महाराज ! मुझ म ईर्ष्या नही है। मैने कभी शराब नही पी है। देव ! मुझ में दूसरो के प्रति न स्नेह है, न कोष है। मैं इन चारो अङ्गो से युक्त हूँ। राजा ने पूछा-छत्तपाणी ! तू अपने आपको ईर्ष्या रहित कहता है ? '-हाँ देव ! मै ईर्ष्या रहित हूँ। 'किस बात को देखकर ईर्ष्या रहित हुआ ?" 'देव ! सुने' कह अपने ईर्ष्या रहित होने का कारण बताते हुए यह गाथा कही- इत्थिया कारणा राज बन्धापेसि पुरोहित, सो म अत्ये निवेसेसि तस्माह अनुसुय्यको ॥ [ राजन ! स्त्री के कारण मैने पुरोहित को बँधवाया। उसने मुझे सदर्थ में लगाया। इसलिए मै ईर्ष्या रहित हूँ।]

इसका अर्थ है कि देव ! मैं पहले इसी वाराणसी नगर में तुम्हारे जैसा ही राजा था। मैने स्त्री के लिए पुरोहित को बँधवाया।

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