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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

३७० [ २.७ २२०

बोधिसत्व प्रात काल का भोजन कर राजद्वार गया। वही छत्तपाणी को देख हाथ से पकड पूछा-मित्र, क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ? "तुझे किसने कहा है कि मै चारो अङ्गो से युक्त हूँ ?" "देवराज शक्र ने।" "किस कारण से कहा ?" "इस कारण से ' कह सब कहा। वह बोला-हाँ, मैं चारो अङ्गो से युक्त हूँ। बोधिसत्व उसे हाथ से पकडे ही पकडे राजा के पास ले जाकर बोला- महाराज, यह छत्तपाणी चारो अङ्गो से युक्त है। उद्यानपाल की आवश्यकता होने पर इसे उद्यानपाल बनावें। राजा ने उसे पूछा-क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ? हां महाराज। 'किन चारो अङ्गो से ?" उत्तर दिया- "अनुसुय्यको अह देव अमज्जपायको अहं, निस्नेहको अह देव अक्कोधन अधिद्वितो ॥ महाराज ! मुझ म ईर्ष्या नही है। मैने कभी शराब नही पी है। देव ! मुझ में दूसरो के प्रति न स्नेह है, न कोष है। मैं इन चारो अङ्गो से युक्त हूँ। राजा ने पूछा-छत्तपाणी ! तू अपने आपको ईर्ष्या रहित कहता है ? '-हाँ देव ! मै ईर्ष्या रहित हूँ। 'किस बात को देखकर ईर्ष्या रहित हुआ ?" 'देव ! सुने' कह अपने ईर्ष्या रहित होने का कारण बताते हुए यह गाथा कही- इत्थिया कारणा राज बन्धापेसि पुरोहित, सो म अत्ये निवेसेसि तस्माह अनुसुय्यको ॥ [ राजन ! स्त्री के कारण मैने पुरोहित को बँधवाया। उसने मुझे सदर्थ में लगाया। इसलिए मै ईर्ष्या रहित हूँ।]

इसका अर्थ है कि देव ! मैं पहले इसी वाराणसी नगर में तुम्हारे जैसा ही राजा था। मैने स्त्री के लिए पुरोहित को बँधवाया।

इस जातक¹ में आए अनुसार ही एक समय इसे जब यह छत्तपाणी

धम्मट्ठ ] ` ३७१ "अब्भदा तत्थ बज्झन्ति यत्थ बाला पभासरे, बद्धापि तत्थ मुच्चन्ति यत्थ धीरा पभासरे ॥" इस जातक¹ में आए अनुसार ही एक समय इसे जब यह छत्तपाणी राजा था, चौंसठ नौकरों के साथ अनाचार कर बोधिसत्त्व के द्वारा अपनी इच्छा-पूर्ति न होने के कारण बोधिसत्त्व को नष्ट करने की इच्छा से देवी ने इसे फोड़ा। इसने बोधिसत्त्व को बँधवा दिया। तब बाँधकर लाए गए बोधिसत्त्व ने देवी का यथार्थ दोष कह स्वयं मुक्त हो, राजा के बँधवाए हुए सभी नौकरो को मुक्त करवा राजा को उपदेश दिया कि इनका और देवी का अपराध क्षमा करे। सब पूर्वोक्त प्रकार से विस्तार से कहनी चाहिए। इसीके बारे में कहा है— इत्थिया कारणा राज बन्धापेसि पुरोहितं, सो मं अस्ये निवेसेसि तस्माहं अनुसुय्यको ॥ तब मैं सोचने लगा—मै सोलह हजार स्त्रियां छोड़ इस अकेली से कामा- सक्त हो, इसे भी सन्तुष्ट न कर सका। इस प्रकार बड़ी कठिनाई से सन्तुष्ट की जा सकने वाली स्त्रियों का क्रोध करना वैसा ही होता है जैसे कोई कपड़ो के पहनने पर उनके मैले होने से क्रोध करे कि यह मैले क्यो होते हैं, अथवा जैसे कोई खाए भोजन के गूह बनने पर क्रोध करे कि यह ऐसा क्यो होता है ? तब मैने दृढ सकल्प किया कि अब से जब तक अर्हत्व प्राप्त न हो जाए तब तक कामभोग के प्रति मेरी ईर्ष्या न हो। उस समय से मै ईर्ष्या-रहित हो गया। इस सम्बंध से ही तस्माहं अनुसुय्यको कहा। तब राजा ने पूछा—मित्र छत्तपाणि ! किस बात को देखकर तू श्रमणक हो गया ? उसने वह बात कहते हुए यह गाथा कही— मत्तो अहं महाराज पुत्तमंसानि खादियं, तस्स सोकेनहं फुट्ठो मज्जपानं विवज्जंयि ॥ [ महाराज ! मैने मद्य पी बेहोश हो अपने पुत्र के मास को खाया। उस शोक से शोकाभिभूत हो मैने मद्यपान छोड दिया।] बन्धनमोक्ख जातक (१२०)

१७२ ८ [ २.७.२२७ महाराज ! पूर्वकाल में मैं तुम्हारी ही तरह वाराणसी का राजा था। शराब के बिना न रह सकता था। बिना मांस का भोजन न खा सकता था। नगर में उपोसथ के दिनों में पशु-हत्या बन्द रहती। रसोइये ने पक्ष की त्रयो- दशी को ही मांस लेकर रख दिया। संभाल कर रखा न होने से उसे कुत्ते खा गए। रसोइये ने उपोसथ के दिन मांस न पा, राजा के लिए नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन बना प्रासाद पर चढ राजा के पास भोजन न ले जा सकने के कारण देवी के पास जाकर पूछा-देवी ! आज मुझे मांस नहीं मिला। बिना मांस का भोजन राजा के पास नहीं ले जा सकता। क्या करूँ ? "तात ! मेरा पुत्र राजा को अत्यन्त प्रिय है। पुत्र को देख कर राजा उसे चूमता हुआ, लाड-प्यार करता हुआ अपना क्षुन्निद्र भी भूल जाता है। मैं पुत्र को सजाकर राजा की गोदी में बिठा दूंगी। उसके पुत्र के साथ खेलते समय तू भोजन लाना।" ऐसा कह उसने अपने पुत्र सुन्दर बालक को सजाकर राजा की गोद में बैठाया। राजा के पुत्र के साथ खेलने समय रसोइया भोजन लाया। शराब के नशे में बेहोश राजा ने पका हुआ मांस न पा पूछा-मांस कहाँ है ? 'देव ! आज दिन पशु-हत्या बन्द रहने से मांस नहीं मिला।' राजा ने 'मुझे मांस नहीं मिलेगा' कह गोद में बैठे प्रिय पुत्र की गर्दन मरोड, जान से मार रसोइये के सामने फेंका और आज्ञा दी-जल्दी से पका कर ला। रसोइये ने वैसा किया। राजा ने पुत्र-मांस के साथ भोजन किया। राजा के भय से न कोई रो पीट सका न कुछ कह ही सका। राजा ने भोजन खा, शय्या पर सो, प्रातःकाल उठ नशे के उतरने पर कहा-मेरे पुत्र को लाओ। उस समय देवी रोती हुई चरणों पर गिर पडी। राजा ने पूछा-'भद्रे ! क्या हुआ ?' बोली-'देव ! कल आपने पुत्र को मारकर पुत्र-मांस के साथ भोजन खाया।' राजा ने पुत्रशोक से अभिभूत हो रो पीट कर 'मुझे यह दुख सुरापान के कारण हुआ' समझ सुरापान में दोष देख बालू से मुँह पोछते हुए प्रतिज्ञा की- "अद्य से मैं अर्हत्व प्राप्त होने तक ऐसी विनाशकारिणी सुरा को कभी नहीं पीऊँगा।" तब से मद्य नहीं पी, इसीलिए मत्तो अह महाराज, यह गाथा कही। तब राजा ने पूछा- मित्र ! क्या देखकर तू स्नेह-हीन हो गया ? उस

धम्मट्ठ ] ३७३
बात को कहते हुए यह गाथा कही— कित्तावासो नामह राजा पुत्तो पच्चेकबोधिस, पत्तं भिन्दित्वा थवितो निस्नेहो तस्स कारणा ॥ [ मैं कित्तबास नाम का राजा था। मेरा पुत्र पच्चेकबुद्ध के पात्र को फोड कर मर गया। उस कारण से मैं स्नेह रहित हो गया।] महाराज ! पहले मैं वाराणसी में कित्तवास नाम का राजा था। मुझे पुत्र हुआ। लक्षण जानने वालो ने उसे देखकर कहा कि इसकी मृत्यु पानी न मिलने से होगी। उसका नाम दुष्टकुमार रखा गया। बालिग होने पर वह उपराजा बना। राजा दुष्टकुमार को सदैव अपने आगे पीछे रखता। पानी न पाकर मरन के भय से, उसके लिए चारो दरवाजो पर और नगर के भीतर जहाँ तहाँ पुष्क- रिणियाँ बनवा दीं। चौरस्तो आदि पर मण्डप बनवा पानी की चाटियाँ रखवाईं। उसने एक दिन सजधज कर अकेले ही उद्यान जाते हुए रास्ते में प्रत्येकबुद्ध को देखा। जनता भी प्रत्येकबुद्ध को देखकर उन्ही को प्रणाम करती, प्रशंसा करती। उन्ही को हाथ जोडती। राजकुमार सोचने लगा—मेरे जैसे के साथ चलते हुए लोग इस सिर-मुण्डे को प्रणाम करते हैं, प्रशंसा करते हैं, हायें जोडते हैं। उसने क्रोधित हो, हाथी से उतर प्रत्येकबुद्ध के पास जाकर पूछा— "श्रमण ! तुझे भोजन मिला?" "राजकुमार ! हाँ मिला।" उसने प्रत्येकबुद्ध के हाथ से पात्र ले, उसे जमीन पर पटक, भोजन सहित पाँव से मर्दन कर, पाँव की ठोकर से चूर चूर कर दिया। प्रत्येकबुद्ध उसके मुँह की ओर देखने लगे—अब यह प्राणी नष्ट हुआ। कुमार बोला—श्रमण ! मैं कित्तवास राजा का पुत्र हूँ। मेरा नाम है दुष्टकुमार। तू मुझ पर क्रोधित हो आँखें फाड फाड कर देखने से मेरा क्या करेगा? प्रत्येक-बुद्ध का भोजन नष्ट हो गया। वे आकाश में उडकर उत्तर हिमालय में नन्दमूल पब्भार पर ही चले गए। राजकुमार के पापकर्म ने भी उसी क्षण फल दिया। उसके शरीर में दाह पैदा हुआ। वह जल रहा हूँ कहता हुआ वही गिर पडा।

३७४ [ २.७.२२० उतना पानी भी सब समाप्त हो गया। सारी घाटियाँ सूख गईं। वहीं उसका प्राणान्त होकर वह अवीची नरक में पैदा हुआ। राजा ने वह समाचार सुन पुत्रशोक से अभिभूत हो सोचा—मेरा यह शोक प्रिय वस्तु से उत्पन्न हुआ। यदि मैं स्नेह न करता, तो शोक न होता। उसने निश्चय किया कि अब से किसी भी चीज में—चाहे वह जानदार हो चाहे बेजान हो—स्नेह पैदा न हो। उस समय से लेकर उसे स्नेह नहीं है। उसी सम्बन्ध से कित्तवासो नामह गाथा कही। पुत्तो पच्चेकबोधिमे पत्त भिन्दित्वा चवितो का अर्थ है कि मेरा पुत्र पच्चेकबुद्ध का पात्र तोडकर मर गया। निस्नेहो तस्स कारणा, उस समय उत्पन्न स्नेह के कारण स्नेह-रहित हो गया। तब राजा ने उसे पूछा—'मित्र ! किस बात को देखकर तू क्रोध-रहित हो गया ?' उसने वह बात बताते हुए यह गाथा कही— अरको हुत्वा मेत्तचित्तं सत्त वस्सानि भावयिं, सत्त कप्पे ब्रह्मलोके तस्मा अवकोधनो अह ॥ महाराज ! मैने अरक नामक तपस्वी हो, सात वर्ष तक मैत्री चित्त की भावना कर सात सवर्त्त विवर्त्त कल्पों तक ब्रह्मलोक में रहा। इसलिए मे दीर्घ काल तक मैत्रीभावना का अभ्यास करने से क्रोधि-रहित हो गया। इस प्रकार छत्तपाणि के अपने चारो अङ्ग कहने पर राजा ने परिषद को इशारा किया। उसी क्षण अमात्यो तथा ब्राह्मण गृहपति आदि ने उठकर 'अरे ! रिश्वतखोर ! दुष्ट चोर ! तू रिश्वत न पाकर पण्डित की निन्दा कर उसे मारना चाहता था' कह काळक के हाथ पाँव पकड, राजमहल से उतार जो जो हाथ मे आया पत्थर, मुद्गर आदि से सिर फोड मार डाला। फिर पाँव से घसीट कर कूडे की जगह पर फेक दिया। उसके बाद से राजा धर्मपूर्वक राज्य करता हुआ कर्मानुसार (परलोक) गया। शास्ता न यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय काळक सेनापति देवदत्त था। छत्तपाणि नाई सारिपुत्र। धर्मध्वज तो में ही था।

२२१. कासाव जातक

दूसरा परिच्छेद ८. कासाव वर्ग २२१. कासाव जातक “अणिक्कसावो कासावं...” यह धर्मदेशना शास्ता ने जेतवन में रहते समय देवदत्त के बारे में कही। घटना राजगृह में घटी। क. वर्तमान कथा एक समय धर्मसेनापति (सारिपुत्र) पांच सौ भिक्षुओं के साथ वेळुवन में रहते थे। देवदत्त भी अपने जैसी दुराचारी परिषद से घिरा हुआ गयाशीर्ष पर रहता था । उस समय राजगृह निवासी चन्दा इकट्ठा करके दान की तैयारी करते थे। व्यापार के लिए आए एक बनिए ने एक मूल्यवान् सुगन्धित काषाय वस्त्र दे कर कहा कि इस वस्त्र का दान कर मुझ भी (दान मे) हिस्सेदार बनावें। नागरिको ने महादान दिया। सब चन्दा करके इकट्ठे किए गए कार्षापणो से ही पूरा हो गया। वह वस्त्र बच गया। लोग इकट्ठे होकर सोचने लगे कि यह वस्त्र किसे दे ? क्या सारिपुत्र स्थविर को ? अथवा देवदत्त को ? कुछ ने कहा सारिपुत्र स्थविर को। दूसरो ने कहा—सारिपुत्र स्थविर कुछ दिन रह कर यथारुचि चल देगा। देवदत्त स्थविर सदैव हमारे नगर ही के पास रहता है। मङ्गल-अमङ्गल में यही हमारा सहायक होता है। देवदत्त को दे। राय लेने पर 'देवदत्त को दे' कहने वालो की संख्या अधिक निकली। उन्होने देवदत्त को दे दिया। देवदत्त ने उसकी डसे कटवा, ओवट्टक वस्त्र सिलवा, रँगवा कर सुनहरी रेशम सदृश बना पहना। उस समय तीस भिक्षुओ ने राजगृह से श्रावस्ती पहुँच, शास्ता को प्रणाम

चीवर को धारण किया, पहले भी धारण किया है' यह पूर्व-जन्म की कथा कही।

३७६ [ २.८ २२१

पर कुशल समाचार पूछे जाने पर, यह समाचार वह निवेदन किया कि भन्ते ! इस प्रकार देवदत्त ने अपने अयोग्य चीवर (=अर्हत्-ध्वजा) को धारण किया। शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने अपने अयोग्य चीवर को धारण किया, पहले भी धारण किया है' यह पूर्व-जन्म की कथा कही।

ख. अतीत कथा

पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व हिमालय प्रदेश में हाथी के कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर वह अस्सी हजार मस्त हाथियों के नायक बन जंगल में रहने लगे। एक गरीब आदमी ने वाराणसी में दन्तकार गली में हाथी-दाँत का काम करने वालों को चूड़ी आदि बनाते देख कर पूछा—हाथी-दाँत मिलें तो लोगे ? उन्होंने कहा—लेंगे। यह शस्त्र ले, काषाय वस्त्र पहन, प्रत्येक-सम्बुद्ध का वेष बना, टोपा पहन, हाथियों की गली में जा, आयुध से हाथियों को मार, दाँत ला, वाराणसी में बेच, जीविका चलाता था। आगे चलकर उसने बोधिसत्त्व के दल के सबसे अन्तिम हाथी को मारना आरम्भ किया। रोज़ रोज़ हाथियों को कम होते देख हाथियों ने बोधिसत्त्व से कहा—किस कारण से हाथी कम हो रहे हैं ? बोधिसत्त्व ने देखभाल करते हुए सोचा—एक आदमी प्रत्येक-बुद्ध का वेष पहनकर हाथियों की कतार के सिरे पर रहता है। कहीं वही तो नहीं मारता है ? उसका पता लगाऊँगा। एक दिन हाथियों को आगेकर स्वयं पीछे पीछे चला। वह आदमी बोधिसत्त्व को देखते ही शस्त्र लेकर कूदा। बोधिसत्त्व ने रुक कर खड़े हो, उसे ज़मीन पर गिरा कुचल कर मार डालने के लिए सूण्ड उठाई। (लेकिन) उसके पहने काषाय वस्त्रों को देख सोचा— इस अर्हत्-ध्वजा का मुझे आदर करना चाहिए। उसने सूण्ड लपेट कर 'भो पुरुष ! यह अर्हत् ध्वजा तेरे योग्य नहीं है। तू इसे क्यों धारण करता है ?' कहते हुए यह गाथाएँ कही—

अनिक्कसावो कासावं यो वत्थं परिदहेस्सति, अपेतो दमसच्चेन न सो कासावमरहति ॥

कासाय ] ३७७ यो च वन्तकसावस्स सीलेसु सुसमाहितो, उपेतो दमसच्चेन स वे कासावमरहति¹ ॥ [जो अपने मन को स्वच्छ किए बिना काषाय-वस्त्र को धारण करता है, सत्य और संयम से रहित वह व्यक्ति काषाय-वस्त्र का अधिकारी नहीं। जिसने अपने मन के मैल को दूर कर दिया है, जो सदाचारी है, सत्य और संयम से युक्त वह व्यक्ति ही काषाय-वस्त्र का अधिकारी है।] अनिक्कसावो, कसाव (=मैल) कहते हैं राग को, द्वेष को, मूढ़ता को, म्रक्ष (=दूसरे के गुणों को मारना) को, प्लास (=अपनी दूसरे गुणी के साथ तुलना करना) को, ईर्षा को, मात्सर्य्य को, माया को, शठता को, अकड को, स्पर्द्धा को, मान को, अतिमान को, मद को, प्रमाद को—सभी अकुशल धर्मों को, सभी दुश्चरित्तों को, संसार के सभी डेढ हज़ार बन्धन क्लेशों को। वे जिस आदमी के प्रहीण नहीं हुए, जिसके (चित्त-) संतान से नहीं निकले, नहीं उखड़े, वह आदमी अनिक्कसावो। कासाव, काषाय रस (रंग) पी हुई अर्हत्- ध्वजा। यो वत्थं परिदहेस्सति, जो ऐसा होकर इस प्रकार का वस्त्र धारण करेगा, पहनेगा। अपेतो दमसच्चेन, इन्द्रिय दमन नामक संयम से तथा निर्वाण नामक परमार्थ-सत्य से दूर। अथवा अपादान (-विभक्ति) के अर्थ में कर्ण; मतलब हुआ इस संयम-सत्य से दूर। सत्य का मतलब यहाँ वाणी का सत्य और चार (आर्य-) सत्य भी हैं। न सो कासावमरहति, वह आदमी कासाव- रहित न होने से काषाय रंग की अर्हंत ध्वजा का अधिकारी नहीं। वह इसके योग्य नहीं। यो च वन्तकसावस्स, जो आदमी उक्त प्रकार के कासाव से मुक्त होने के कारण काषाय-रहित है। सीलेसु सुसमाहितो, मार्ग-शील तथा फल शील में सम्यक् स्थित, लाकर स्थापित कर दिए की तरह उनमें प्रतिष्ठित, उन शीलों से युक्त के लिए यह प्रयोग है। उपेतो, सम्पन्न, युक्त। दमसच्चेन, उक्त प्रकार के दमन से तथा सत्य से। स वे कासावमरहति, वह इस प्रकार का आदमी ही इस काषायवर्ण की अर्हत्ध्वजा का अधिकारी है। ¹ धम्म पद (१/९,१०)

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।

३७८ [ २.८.२२२ इस प्रकार बोधिसत्त्व ने उस आदमी को यह बात कह, 'इसके बाद इधर न आना, यदि आया तो तेरी जान नहीं बचेगी' डराकर भगा दिया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय हाथी मारने वाला आदमी देवदत्त था। दलपति मैं ही था। २२२. चुल्लनन्दिय जातक "इध तवाचरियवचो..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। एक दिन धर्मसभा में भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! देवदत्त कठोर है, परुष है, दुस्साहसी है, सम्यक्-सम्बुद्ध को मारने वाले नियुक्त किए, उन पर दुश्शीलता का आरोप लगाया, नालागिरि (हाथी) का प्रयोग किया, तथागत के प्रति उसकी शान्ति, मैत्री, दया कुछ भी नहीं। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो? अमुक बातचीत। 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त कठोर, परुष तथा दयाहीन है, वह पहले भी कठोर, परुष तथा दयाहीन ही रहा है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व हिमालय प्रदेश में नन्दिय नामक वानर हुए। उनके छोटे भाई का नाम था चुल्लनन्दिय। वे दोनो अस्सी हजार वानरों के नेता हो हिमालय प्रदेश में अन्धी माता की सेवा करते हुए रहते थे। वे माता को झाड़ी में सुला स्वयं जंगल में जा वहाँ से मीठे मीठे फल ले माता के पास भेजते। लाने वाले उसे न देते। वह भूख से पीडित हो हड्डी-चर्म मात्र रह गई।

चुल्लनन्दिय ] ३७६ बोधिसत्त्व ने कहा—मा, हम तुम्हे मधुर फल भेजते है। तुम किसलिए कुम्हला रही हो ? "तात ! मुझे नही मिलते।" बोधिसत्त्व ने सोचा—यदि मै दल की नेतागिरी करता रहा तो माता मर जाएगी। मै दल को छोड माता की ही सेवा करूँगा। उसने चुल्लनन्दिय को बुलाकर कहा—तात ! तू दल की नेतागिरी कर। मैं माता की सेवा करूँगा। उसने भी अपने भाई से कहा—मुझे दल की नेतागिरी से काम नही। मै भी माता की ही सेवा करूँगा। वे दोनो एकमन हो दल को त्याग, माता को ले हिमवन्त को छोड़ सीमान्त में न्यग्रोध-वृक्ष के नीचे रहते हुए माता की सेवा करने लगे। एक वाराणसी-वासी ब्राह्मण-विद्यार्थी ने तक्षशिला में सर्वप्रसिद्ध आचार्य्य के पास सब विद्यायें ग्रहण कर पूछा—अब में जाऊँ ? आचार्य्य ने विद्या के प्रताप से उसका कठोर, परुष तथा दुस्साहसी स्वभाव जान 'तात ! तू कठोर, 'परुष तथा दुत्साहसी हैं। ऐसे लोगो को सब समय एक सा ही नही होता। महा-विनाश, महा-दुख को प्राप्त होते है। तू कठोर मत हो। ऐसा काम मत कर जिससे पीछे पछताना पड़े' उपदेश दे विदा किया। उसने आचार्य्य को प्रणाम कर, वाराणसी पहुँच, घर बसा सोचा कि मैं किसी दूसरे शिल्प से जीविका न चला सकूँगा। इसलिए मैं धनुष के सिरे से जीवित रहूँगा। मै शिकारी का काम कर जीविका चलाऊँगा। वह वारा- णसी से निकल सीमान्त के गाँव मे रहते हुए धनुष-तरकस बाँध, जगल में जा नाना प्रकार के पशुओ का मार मास बेचकर जीविका चलाने लगा। एक दिन उसे जगल में कुछ नही मिला। घर लौटते हुए उसने खुले मैदान के एक सिरे पर एक वट-वृक्ष देखा। शायद यहाँ कुछ मिले सोच वह वट-वृक्ष की ओर गया। उसी समय दोनो भाई माँ को फल खिला उसे आगे करके वृक्ष के नीचे बैठे थे। जब उन्होने उस शिकारी को आते देखा, तो सोचा कि हमारी मा को देखकर भी क्या करेगा ? वे स्वय शाखाओ के बीच मे छिप गए। उस निर्दयी आदमी न भी वृक्ष के नीचे पहुँच, उनकी उस बुढापे से दुर्बल अन्धी माँ को देख

३८० [ २८.२२२ कर सोचा—खाली हाथ जाने से मुझे क्या लाभ ? इस बन्दरी को मार कर जाऊँगा। उसने उसे मारने के लिए धनुष हाथ में लिया। बोधिसत्व ने यह देख चुल्लनन्दिय को कहा—तात ! यह आदमी मेरी मां को बींधना चाहता है। मैं इसे अपना जीवन दान दूंगा। तू मेरे मरने पर माता की सेवा करना। फिर शाखाओं की ओट से निकल 'हे पुरुष ! मेरी मां को मत मार। यह अन्धी है। बुढापे से दुर्बल है। मैं इसे जीवनदान देता हूँ। तू इसे न मार कर मुझे मार' कह उससे प्रतिज्ञा करा जाकर तीर के पास बैठा। उस निर्दयी ने बोधिसत्त्व को बींध, गिराकर फिर उसकी मां को भी मारने को धनुष उठाया। इसे देख चुल्लनन्दिय ने सोचा—यह मेरी मां को मारना चाहता है। एक दिन भी यदि मेरी मां जी सके, तो 'प्राण बचे' ही कहा जाएगा। मैं इसे अपना जीवनदान दूंगा। उसने शाखाओं की ओट से निकल कर कहा—"भो पुरुष ! मेरी मां को मत मार। मैं इसे जीवन-दान देता हूँ। तू मुझे मार। हम दोनो भाइयो को ले जाकर हमारी मां को जीवन- दान दे।" उससे प्रतिज्ञा ले, वह तीर के पास जा बैठा। शिकारी उसे मार 'यह घर पर बच्चो के लिए होगी' सोच, उनकी माता को भी मार, तीनो जना को लेकर घर की ओर गया। इस पापी के घर पर बिजली गिर पडी। उसकी भार्य्या और दो लडके घर के साथ ही जल गए। पृष्ठ-वांस और खम्बा मात्र बचे। गाँव के दरवाजे पर ही एक आदमी ने उसे देख यह समाचार कहा। वह स्त्री-बच्चों के शोक से इतना अभिभूत हुआ कि उसी जगह पर मास की बहँगी और धनुष छोड, वस्त्र उतार, नंगा हो बाँहे पछाड़ रोता हुआ घर गया। वह खम्बा टूट कर सिर पर गिर पडा। सिर फट गया। पृथ्वी ने विवर दे दिया। अवीचि नरक से अग्नि-ज्वाला निकली। जब वह पृथ्वी से निगला जा रहा था, उसने आचार्य्य के उपदेश को याद कर 'इसी बात को देख पाराशर्य ब्राह्मण ने मुझे उपदेश दिया था' रोते हुए इन दो गाथाओ को कहा— इदं सदाचरियवचो पारासरियो यदब्रवी, मासु त्वं अकरा पाप यं त्वं पच्छा कत तपे ॥

पुटभत्त ] ३८१ यानि करोति पुरिसो तानि अत्तनि पस्सति कल्याणकारी कल्याणं पापकारी च पापकं, यादिसं वपते बीजं तादिसं हरते फलं ॥ इसका अर्थ-जो पारासरिय (पाराशर्य) ब्राह्मण ने कहा कि तू पापकर्म मत कर, पीछे तुझे ही कष्ट देगा-यह उस आचार्य्य का वचन है। आदमी शरीर, वाणी अथवा मन से जो भी कर्म करता है उनका फल पाता हुआ उन्ही कर्मों को अपने में देखता है। शुभकर्म करने वाला शुभफल पाता है, पापकर्म करने वाला बुरा अनिष्टकर फल पाता है। दुनिया म भी जैसा बीज बोता है, वैसा ही फल पाता है। बीज के अनुसार बीज के अनुरूप ही फल ल जाता है, ग्रहण करता है, भोगता है। इस प्रकार रोता हुआ यह पृथ्वी में दाखिल हो अवीची महानरक मे पैदा हुआ। शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त कठोर, परुष तथा दयाहीन है, वह पहले भी कठोर, परुष तथा दयाहीन ही रहा है' कह यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिकारी देवदत्त था। चारो दिशाओ म प्रसिद्ध आचार्य्य सारिपुत्त। चुल्लनन्दिय आनन्द। माता महाप्रजापति गौतमी। महानन्दिय तो मैं ही था। २२३. पुटभत्त जातक "नमे नमन्तस्स..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक कुटुम्बी के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

३८२ [ २.८.२२३ क. वर्तमान कथा श्रावस्ती नगर निवासी एक गृहस्थ जनपदनिवासी एक गृहस्थ के साथ लेन-देन करता था। वह अपनी भार्या को लेकर अपने करजदार के पास गया। उसने 'दे नहीं सकता हूँ' कह, कुछ न दिया। वह क्रुद्ध हो बिना कुछ खाए ही चल दिया। रास्ते में उसे भूख से पीड़ित देख, रास्ता चलने वाले आदमियो ने भात की पोटली दी—भार्या को भी देकर खाओ। उसने वह ले उसे न देने की इच्छा से कहा—भद्रे, यह चोरो के ठहरने का स्थान है। तू आगे आगे जा। फिर सब भात खा चुकने पर उसे खाली पोटली दिखा कहा—भद्रे, उन्होने भात-रहित खाली पोटली ही दी। यह जान कि यह अकेला ही खा गया, उसे दुःख हुआ। वे दोनो जेतवन विहार की पिछली तरफ से जाते हुए पानी पीने के लिए जेतवन मे प्रविष्ट हुए। शास्ता भी उनके आने की प्रतीक्षा करते हुए गन्धकुटी की छाया मे वैसे ही बैठे जैसे रास्ता घेर कर कोई शिकारी बैठा हो। वे दोनो शास्ता को देख, पास जा, प्रणाम कर बैठे। शास्ता ने उनका कुशल समाचार पूछ स्त्री से प्रश्न किया—भद्रे ! क्या यह तेरा स्वामी तेरा हितैषी है, क्या तेरे प्रति स्नेह रखता है ? “भन्ते, मेरा तो इसके प्रति स्नेह है, किन्तु यह मेरे प्रति स्नेह-रहित है। और दिनो की बात रहने दे आज ही इसे रास्ते म भात की पोटली मिली। यह बिना मुझे दिए ही स्वयं खा गया।” “उपासिका, तू नित्य इसकी हितैषिणी तथा इसके प्रति स्नेह रखती रही है। यह स्नेह रहित ही रहा है। लेकिन जब इसे पण्डितों की जबानी तेरे गुण मालूम होते हैं, तो यह तुझे सारा ऐश्वर्य दे देता है।” उसके प्रार्थना करने पर (भगवान् ने) पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल म वाराणसी म ब्रह्मदत्त के राज्य करन के समय बोधिसत्त्व आमात्य कुल में पैदा हो बड़े होने पर उसके अर्थधर्मानुशासक हुए।

पुटभत्त ] ३८३ राजा ने अपने पुत्र पर षड्यन्त्र का सन्देह पर उसे निकाल दिया। वह अपनी भार्य्या सहित नगर से निकल काशी मे एक गामडे म रहने लगा। आगे चलकर जब उसने पिता के मरने का समाचार सुना तो कुताशा राज्य को लने के लिए वापिस बनारस आया। रास्ते म उस भार्य्या को भी देकर खान के लिए भात की पोटली मिली। उसने भार्य्या को न दे अकेले ही खाया। भार्य्या कठोर-हृदय जान बडी दुखी हुई। यह बाराणसी का राजा हो उसे पटरानी बना 'इतना ही इसके लिए पर्याप्त है' समझ उसका और कोई सत्कार सम्मान न करता। कैसे दिन कटते है ? तब न पूछता। बोधिसत्त्व ने सोचा—यह देवी राजा का बहुत उपकार करने वाली है, उसके प्रति स्नेह रखती है, लेकिन राजा इसे कुछ नही मानता। इसका सत्कार-सम्मान करवाऊँगा। बोधिसत्त्व न पास जा आदर पूर्वक एक ओर खडे हो 'तात क्या है ?' पूछने पर बातचीत चलाने के लिए कहा—देवी ! हम तुम्हारी सेवा करते हैं। क्या बडे वडो को वस्त्र-खण्ड या भात नही देना चाहिए ? "तात, में स्वय कुछ नही पाती। तुम्हे क्या दूँगी। जब मिलता था दिया। अब राजा मुझे कुछ नही देता। दूसरी किसी चीज की बात जाने द। राज्य ग्रहण करने के लिए आन के समय रास्ते म भात की पोटली पा मुझे भात तक न दे अपने ही खाया।" 'अम्म ! क्या राजा के सामने ऐसा कह सकेगी ?' "तात ! कह सकूँगी।" "तो आज ही जब में राजा के सामने खडा होकर पूछूँ तो ऐसा कहना। में आज ही तेरे गुण प्रकट करूँगा।" ऐसा कहँ बोधिसत्त्व पहले से जाकर राजा के सामने खडा हुआ। वह भी जाकर राजा के सामने खडी हुई। बोधिसत्त्व ने उसे कहा—अम्म ! तुम अति कठोर-हृदया हो। क्या वडे बूडो को वस्त्र या भात नही देना चाहिए ? "तात ! मुझे ही राजा से कुछ नही मिलता। तुम्हें क्या दूँगी।" "क्या पटरानी नही हो ?" 'तात ! कुछ सम्मान न मिलने पर पटरानी होने से क्या होगा ? अब

३८४ [ २.८ २२३ मुझे तुम्हारा राजा क्या देगा। उसने रास्ते में भात की पोटली पा, उसमें से कुछ भी न दे स्वयं खाया।" बोधिसत्त्व ने पूछा— “महाराज, क्या ऐसी बात है ?” राजा ने स्वीकार किया। बोधिसत्त्व ने राजा 'स्वीकार करता है' जान देवी को कहा— “देवी ! राजा को अप्रिय होने पर तुम्हे यहाँ रहने से क्या लाभ ? संसार में अप्रिय का साथ दुखदायी होता है। तुम्हारे यहाँ रहने से राजा को अप्रिय के साथ रहने का दुख होगा। 'प्राणी मिलने वाले के साथ मिलते हैं, न मिलने वाले के साथ नहीं मिलते' जान दूसरी जगह चला जाना चाहिए। दुनिया बहुत बड़ी है।” इतना कह यह गाथाएँ कही— नमे नमन्तस्स भजे भजन्त किच्चानुकुब्बस्स करेय्य किच्च, नानत्थकामस्स करेय्य अत्थ असम्भजन्तम्पि न सम्भजेय्य ॥१॥ चजे चजन्तं घणयं न कयिरा अपेताचित्तेन न सम्भजेय्य, द्विजो दुमं खीरणफलं ति अत्वा अञ्ञं समवेक्खेय्य महा हि लोको ॥२॥ [ झुकने वाले के सामने झुके। संगति करना चाहने वाले के साथ संगति करे। जो अपने काम आता हो उसका काम करे। अनर्थ चाहने वाले का अर्थ न करे। जो संगति करना न चाहता हो, उससे संगति न करे ॥१॥ छोड़ने वाले को छोड़ दे। ऐसे से स्नेह न करे। जिसका दिल विमुख हो गया हो, उससे संगति न करे। जिस तरह पक्षी वृक्ष को फलरहित जानकर दूसरे (वृक्ष) को ढूँढते हैं, उसी तरह दूसरे को ढूँढे। संसार बड़ा है ॥२॥ ]

कुम्भील ] ३८५ नमे नमन्तस्स भजे भजन्त जो अपने सामने झुके उसी के सामने झुके। जो संगति करता है उसी से संगति करे। किच्चानुकुब्बस्स करेय्य किच्चं, काम पड़ने पर जो अपने काम आये, काम पड़ने पर उसका भी काम करे। चजे चजन्तं वणयं न कयिरा अपने को छोड़ने वाले को छोड़ ही दे। उससे तृष्णा नामक स्नेह न करे। अपेतचित्तेन विगन चित्त से वा बदलं हुए चित्त (वाले) के साथ। न सम्भजेय्य वैसे के साथ न मिले जुले। द्विजो दुमं जैसे पक्षी पहले फले होने पर भी जब वृक्ष के फल नहीं रहते तो क्षीणफल हुआ जान उसे छोड़ दूसरे को देखता है, खोजता है उसी तरह अञ्ञं समवेक्खेय्य महा हि यहु लोको। तुम्हें स्नेह करने वाला एक न एक आदमी मिल जायगा। यह सुन बाराणसी राजा ने देवी को सब ऐश्वर्य दिये। तब से लगाकर मिल जुलकर प्रसन्नता पूर्वक रहने लगे। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर दोनो पति पत्नी स्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुए। उस समय पति पत्नी यह दोनो पति पत्नी थे। पण्डित ग्रामात्य तो मैं ही था। २२४. कुम्भार जातक¹ “यस्सेते चतुरो धम्मा...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। ¹देखें वानरिंद जातक (५७)। कथा समान है। केवल एक गाथा अधिक है। २५

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मैं ही

३८८ [ २.८.२२६ आमात्य समझ गया कि राजा ने उसीके बारे मे कहा है। उसके बाद से उसने रणवास को दूषित करने का साहस नहीं किया। उसके सेवक ने भी यह जानकर कि आमात्य को पता लग गया है उसके बाद से वह कर्म करने का साहस नहीं किया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मैं ही बाराणसी-राजा था। वह आमात्य भी राजा ने शास्ता को कह दिया जान तब से यह कर्म नहीं कर सका। २२६. कोसिय जातक “काले निक्खमणा साधु. ” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय कोशल नरेश के बारे में कही। क. वर्तमान कथा कोशल राजा प्रत्यन्त देश को शान्त करने के लिए गैर मुनासिब समय पर निकल पड़ा। कथा उपरोक्त कथा¹ के सदृश ही है। ख. अतीत कथा शास्ता ने पूर्व(-जन्म) की कथा लाकर कहा—महाराज ! पूर्वकाल मे बाराणसी नरेश ने नामुनासिब समय निकल उद्यान में पड़ाव डलवाया। उसी समय एक उल्लू बाँसो के झुण्डो मे घुस कर छिप रहा। कौओ की सेना ने आकर उसे घेर लिया कि निकलते ही पकडेगे। उसने सूर्यास्त तक ¹देखें कळाय मुट्ठि जातक (१७६)

कोसिय ] ३८६ गिरा रहे समय रहते ही निकलकर भागना आरम्भ किया। कौओ ने उसे घेर चोचो से ठांगे मार मार कर गिरा दिया। राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर पूछा—तात ! यह कौवे उल्लू को क्यो मार गिरा रहे हैं ? बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया-महाराज ! अपने निवासस्थान से असमय बाहर निकलने वाले इस प्रकार का बुरा अनुभव करते ही हैं। इसलिए नामुनासिब समय पर अपने स्थान से नहीं निकलना चाहिए। यह बात कहते हुए ये दो गाथाएँ कहीँ— काले निक्खमणा साधु नाकाले साधु निक्खमो, अकालेनेहि निक्खम्म एकम्पि बहूजनो; न किञ्चि अत्थं जोतेति धङ्कारोनाव कोसिय ॥ धीरो च विधिविधानञ्जू परेस विवरन्तगू, सब्बामित्ते वसीकत्वा कोसियोव सुखी सिया ॥¹ [ समय पर (घर से बाहर) निकलना अच्छा है। असमय निकलना अच्छा नही। असमय पर निकलने से किसी लाभ को प्राप्त नहीं करता। अकेले को भी बहुत जन (मार देते हैं) जैसे कौवा की सेना न उल्लू को। धीर, विधि-विधान को जानने वाला, तथा दूसरे के मार्ग पर चलने वाला सभी शत्रुओ को वशीभूत कर (पण्डित) उल्लू की तरह सुखी होने ] काले निक्खमणा साधु महाराज निष्क्रमण का मतलब है निकलने का पराक्रम करना, यह उचित समय पर ही अच्छा होता है। नाकाले साधु निक्खमो असमय अपने निवासस्थान से दूसरे स्थान पर जाना—निकलना या पराक्रम करना—ठीक नहीं। अकालेनेहि इत्यादि चारो पदो मे पहले से तीसरे और दूसरे से चौथे का सम्बन्ध जोडकर इस प्रकार अर्थ जानना चाहिए। अपने निवासस्थान से असमय निकलकर आदमी न किञ्चि अत्थं जोतेति अपनी कुछ भी उन्नति नहीं कर सकता। सो एकम्पि बहूननो बहुत मे भी ¹गाथाओं का टीकाकार ने जो अर्थ दिया है वह ठीक नहीं है। प्रतीत होता है कि कथा अन्यथा हो गई है।

३६० [ २.८.२२६ वे शत्रु इसे अकेला निकला वा जाता देख मारकर महाविनाश को पहुँचा देंगे। यह उपमा है—यङ्ककसेनाय कोसियं जिस प्रकार यह कौओं की सेना इस असमय पर निकले, जाने उल्लू को चोंच से ठोंगे मारती है, महाविनाश को प्राप्त करती है वैसे ही। इसलिए पशु-पक्षियों तक को भी—किसीको भी असमय पर अपने निवासस्थान से नहीं निकलना चाहिए, नहीं चल पड़ना चाहिए। दूसरी गाथा में धीर का मतलब है पण्डित। विधि पुराने बुद्धिमान लोगों द्वारा स्थापित परम्परा। विधानं हिस्सा या क्रम। विवरन्तगू भेद को जानते हुए। सब्बामित्ते सभी शत्रु। वसी कत्वा अपने वश में करके। कोसियोव इस मूर्ख उल्लू से भिन्न किसी दूसरे बुद्धिमान उल्लू की तरह। मतलब यह है कि जो बुद्धिमान 'इस समय निकलना चाहिए, पराक्रम करना चाहिए; इस समय नहीं निकलना चाहिए, नहीं पराक्रम करना चाहिए' यह पुराने पण्डितों द्वारा स्थापित परम्परा नामक जो विधि है उसके विभाग नामक विधान को, अथवा विधि के विधान, क्रम वा अनुष्ठान को जानता है; वह विधिविधान को जानने वाला पराए और अपने भेद को जानकर जैसे बुद्धिमान उल्लू रात्रि को अपने समय पर निकल पराक्रम कर जहां तहां सोए हुए कौओ के सिरों को छेदता हुआ उन सभी शत्रुओं को वश में कर सुखी होता है, इस प्रकार बुद्धिमान आदमी समय पर निकल पराक्रम कर अपने शत्रुओं को वश में कर सुखी होवे, दुःखरहित होवे। राजा बोधिसत्व का कहना सुन रुका। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। पण्डित आमात्य तो मैं ही था।

२२७. गूथपाणक जातक

गूथपाणक ] ३६१ २२७. गूथपाणक जातक “सूरो सूरेण सङ्गम्म....” यह शास्ता ने जेतवन मे रहते समय एक भिक्षु के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा उस समय जेतवन से गव्यूति¹, आधे योजन की दूरी पर एक निगम-ग्राम था। यहाँ से बहुत शलाका-भोजन² मिलता था। वहाँ एक प्रश्न पूछने वाला ठिंगना व्यक्ति रहता था। वह शलाका-भोजन तथा पाक्षिकभोजन लेने के लिए गए तरुण भिक्षु तथा सामणेरो से 'कौन खाते हैं ? कौन पीते हैं ? कौन भोजन करते हैं ?' आदि प्रश्न पूछता। उत्तर न दे सकने पर उन्हे लज्जित करता। वे उसके भय से शलाका भोजन तथा पाक्षिक-भोजन लेने उस गाँव न जाते। एक दिन एक भिक्षु शलाका बाँटने के स्थान पर जाकर बोला—भन्ते ! क्या अमुक गाँव में शलाका-भोजन या पाक्षिक-भोजन है ? “आयुष्मान् ! है, किन्तु वहाँ एक ठिंगना व्यक्ति है जो प्रश्न पूछता है। उत्तर न दे सकने पर गाली देता है, अपशब्द कहता है। उसके भय से कोई नही जा सकते हैं।” “भन्ते ! वहाँ के भोजन मेरे जिम्मे कर। मै उस का दमन कर, उसे निर्विष करके ऐसा बना दूँगा कि आगे से तुम्हे देख कर भागे।” भिक्षुओ ने 'अच्छा' कह वहाँ का भोजन उसके जिम्मे कर दिया। ¹गव्यूति=१/४ योजन। ²शलाक भत्त—गृहस्थों के घर से शलाका से प्राप्त होने वाला भोजन।