भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423

४०६ [ २.६.२३१ कहा- आचार्य ! अब में राजाओ की सेवा में रहूँगा। बोधिसत्व ने 'तात' अच्छा' यह महाराजा से कहा- "महाराज ! मेरा शिष्य आपकी सेवा में रहना चाहता है।" 'अच्छा ! रहे।' 'तो उसका वेतन कह दे।' 'आपका शिष्य आपके बराबर नहीं पा सकता। आपको सौ मिलने पर उसे पचास मिलेंगे, दो (सौ) मिलने पर एक (सौ) ।" उसने घर जाकर शिष्य से कहा। शिष्य बोला- "आचार्य ! मैं आपके बराबर शिल्प जानता हूँ। यदि जितना आप पाते हैं उतना ही वेतन मिलेगा तो राजा की सेवा में रहूँगा, नहीं तो नहीं रहूँगा।" बोधिसत्त्व ने यह वृत्तान्त राजा से कहा। राजा बोला- यदि वह तुम्हारे जितना शिल्प जानता है तो तुम्हारे बराबर शिल्प दिखा सकने पर उसे तुम्हारे बराबर मिलेगा। बोधिसत्व ने अपने शिष्य से यह बात कही। उसने कहा 'अच्छा, मैं दिखाऊँगा।' बोधिसत्त्व ने राजा से कहा। राजा बोला, तो कल शिल्प दिखा। शिष्य ने कहा- दिखाऊँगा, नगर में मुनादी करा दे। राजा ने मुनादी करा दी कि कल आचार्य और उनका शिष्य हस्ति- शिल्प दिखाएँगे। जो देखना चाहे वे राजाङ्गण में इकट्ठे होकर देख। आचार्य ने यह सोच कि मेरा शिष्य उपाय-कुशल नहीं है एक हाथी ले उसे एक ही रात में 'उलटी बात' सिखाई- चल कहने पर पीछे हटना, पीछे हटो कहने पर चलना, खड़ा हो कहने पर लेटना, लेट कहने पर खड़ा होना, पकड़ कहने पर रखना तथा रख कहने पर पकड़ना। इस प्रकार सिखा, अगले दिन वह उस हाथी पर चढ राजदरबार मे पहुँचा। शिष्य भी एक सुन्दर हाथी पर चढ़ा। जनता इकट्ठी हुई। दोनो ने बराबर शिल्प दिखाया। बोधिसत्त्व ने अपने हाथी से (हाथी) बदल लिया। वह चल कहने पर पीछे हटा। पीछे हट कहने पर आगे दौड़ा। खड़ा हो कहने पर लेट गया। लेट कहने पर खड़ा हुआ। (उसने) पकड़ कहने पर रख दिया। रख कहने पर पकड़ा। जनता बोली- अरे दुष्ट शिष्य ! तू आचार्य के साथ झगड़ा करता है। अपनी सामर्थ्य नहीं जानता। समझता है कि मैं आचार्य के बराबर जानता हूँ। फिर जनता ने उसे ढेले और डण्डो की मार से वहीं मार डाला।