जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४८ [ २१० २४४ एक परिव्राजक को सारे जम्बूद्वीप मे शास्त्रार्थ करने वाला न मिला। उसने उस निगम में पहुँच पूछा—मेरे साथ शास्त्रार्थ कर सकने वाला कोई है ? पता लगा—है। वह बोधिसत्व की प्रशसा सुन अनेक आदमियो के साथ उसके निवासस्थान पर पहुँच, कुशल क्षेम पूछ कर बैठा। बोधिसत्व ने पूछा—वनगन्ध से सुगन्धित गङ्गाजल पीएगा ? परिव्राजक ने शास्त्रार्थ आरम्भ करते हुए कहा—कौनसी गङ्गा ? बालू गङ्गा है ? जल गङ्गा है ? इधर का किनारा गङ्गा है ? अथवा उधर का किनारा गङ्गा है ? बोधिसत्व ने उसे उत्तर दिया—परिव्राजक ! उदक, बालू, इधर के किनारे और उधर के किनारे के अतिरिक्त और गङ्गा कहाँ है ? परिव्राजक को कुछ उत्तर न सूझा। वह उठकर भाग गया। उसके भाग जाने पर बोधिसत्व ने बैठे हुए लोगो को उपदेश देते हुए यह गाथाएँ कही— यं पस्सति न त इच्छति यञ्च न पस्सति तं किर इच्छति, मञ्ञामि चिरं चरिस्सति न हि तं लच्छति यं सो इच्छति ॥१॥ यं लभति न तेन तुस्सति यं पत्थेति लद्धं हीळेति, इच्छा हि अनन्तगोचरा वीतिच्छानं नमो करोमसे ॥२॥ [ जिसे देखता है उसको इच्छा नही करता, जिसे नही देखता है उसकी इच्छा करता है। मै समझता हूँ कि यह चिरकाल तक भटकेगा। जिसकी इच्छा करता है वह इसे नही मिलेगा ॥१॥ जो मिलता है उससे सन्तुष्ट नही होता। जिसकी इच्छा करता है वह मिलने पर उसका अनादर करता है। इच्छा की गति अनन्त है। जो वीतिच्छा हैं, उन्हे हम नमस्कार करते हैं ॥२॥ ] यं पस्सति जिस उदक आदि को देखता है, उसे गङ्गा नही मानता है। यञ्च न पस्सति जिस उदक आदि से रहित गङ्गा को नही देखता उसकी इच्छा करता है। मञ्ञामि चिरं चरिस्सति मै ऐसा मानता हूँ कि यह परि- व्राजक इस प्रकार की गङ्गा को खोजत हुए चिरकाल तक भटकेगा, अथवा