भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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मूलपरियाय ] ४४६ जैसे उदक आदि से रहित गङ्गा को उसी तरह रूप आदि से रहित आत्मा को भी खोजते हुए ससार मे चिरकाल तक भटकेगा । न हि तं लच्छति चिरकाल तक विचरते हुए भी वह जो इस प्रकार की गङ्गा या आत्मा की इच्छा करता है उसे न प्राप्त कर सकेगा। यं सम्भति जो उदक वा रूप आदि मिलता है उससे सन्तुष्ट नही होता । यं पत्येति लद्धं हीळेति इस प्रकार प्राप्त से असन्तुष्ट हो जिस जिस सम्पत्ति को प्राप्त करता है, उस उस को प्राप्त करके 'इससे क्या' कहकर उसका अनादर करता है, उसकी अवमानना करता है। इच्छा हि अनन्तगोचरा जो जो प्राप्त हो उसका अनादर कर दूसरी दूसरी चीज की इच्छा करने के कारण यह इच्छा, यह तृष्णा अनन्त गति वाली है। वीतिच्छान नमो करोमसे इसलिए जो इच्छा रहित बुद्ध आदि हैं उनको हम नमस्कार करते हैं । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का परिव्राजक ही इस समय का परिव्राजक है। तपस्वी तो मैं ही था। २४५. मूलपरियाय जातक "कालो घसति भूतानि .." यह शास्ता ने उक्कठ्ठा के पास सुभगवन में विहार करते हुए मूलपरियाय सुत्त¹ के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय तीन वेदों में पारङ्गत पाँच सौ ब्राह्मणों ने (बुद्ध-) शासन में प्रव्रजित हो तीनो पिटक सीख कर अभिमान में चूर हो सोचा-सम्यक् सम्बुद्ध ¹मज्झिम निकाय का प्रथम सुत्त। २६ ०