भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

असिलक्खण ] ६३ जब ब्राह्मण तलवार निकालकर सूँघने लगा तो मिर्चों के चूर्ण के उसकी नाक को लगने से उसे छींक आई । छींक आने से उसकी नाक तलवार से लगी; और उसके दो टुकड़े हो गए । उसकी इस तरह नाक कटने की बात भिक्षु-सघ में प्रकट हो गई । एक दिन धर्म-सभा मे बैठे हुए भिक्षुओं ने बात चलाई—आयुष्मानो ! राजा के तलवार का लक्षण बतानेवाले ने तलवार का लक्षण बताते हुए नाक कटवा ली। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, इस ब्राह्मण ने न केवल अभी तल- वार सूँघते हुए नाक कटवाई, पहले भी कटवाई है' कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, उसके यहाँ तलवार का लक्षण कहनेवाला एक ब्राह्मण था। (इसके आगे की सारी कथा 'वर्तमान-कथा' की तरह ही है) । राजा ने उसे वैद्य के पास भेजकर उसकी नाक की चिकित्सा कराई । फिर लाख से उसकी नाक के सदृश ही एक नाक बनवाकर उसे फिर अपनी सेवा में नियुक्त किया । वाराणसी नरेश को कोई पुत्र न था । एक लडकी और एक भानजा था । उन दोनो को भी उसने अपने पास ही रखकर पाला था । एक साथ रहने के कारण वह् परस्पर प्रेम में बँध गए । राजा ने आमात्यों को बुलाकर सलाह की कि मेरा भानजा राज्य का उत्तराधिकारी है ही, इसे ही लडकी देकर इसका राज्याभिषेक कर दिया जाए । लेकिन फिर सोचा, भानजा तो हर तरह से आत्मीय है ही, इसके लिए कोई दूसरी राजकुमारी लाकर दी जाए । फिर इसका अभिषेक किया जाए । और अपनी लडकी किसी दूसरे राजा को दी जाए । इस प्रकार हमारे रिश्तेदार बहुत होगे; और हम ही दोनो राज्यो के स्वामी होगे । उसने मन्त्रियो की सलाह से निश्चय किया कि दोनो को पृथक पृथक रखना चाहिए; एक को एक घर में दूसरे को दूसरे में रक्खा । सोलह वर्ष की अवस्था होने पर उनका परस्पर का आकर्षण और भी बढ गया ।