भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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[ १३ ] विषय पृष्ठ १५६ अलीनचित्त जातक १५६ [ बढइयो ने हाथी के पाँव का कांटा निकाला। कृतज्ञ हाथी पहले स्वय उनकी सेवा करता रहा। बाद म अपना लडका दे दिया। उस हाथी-बच्चे ने बहुतो को उपकृत किया। ] १५७ गुण जातक १६५ [ दलदल में फंसे सिंह को सियार ने बाहर निकाला। सिंह अन्त तक कृतज्ञ रहा। ] १५८ सुहनु जातक १७२ [ लोभी राजा चाहता था कि व्यापारियो क घोड उसे कम मूल्य में मिल जाएँ। बोधिसत्त्व ने उसकी योजना विफल कर दी। ] १५९ मोर जातक १७६ [ रानी ने सुनहर रग के मोर के लिए जान दे दी। राजा ने सोने के पट्टे पर लिखवाया—जो सुनहरे मोर का मास खाते हैं, वे अजर अमर हो जाते हैं। मोर ने पूछा—मैं तो मरूँगा, मेरा मास खानेवाले क्यो नही ? ] १६० विनीलक जातक १८२ [ हस ने कौवी के साथ सहवास किया। विनीलक पैदा हुआ। हस उसे अपने बच्चो के समान रखना चाहता था किन्तु वह अयोग्य सिद्ध हुआ। ] २. सन्थव वर्ग १८४ १६१. इन्दसमानगोत्त जातक १८५ [ मैत्री बराबर वाले के साथ करनी चाहिए। इन्द- समानगोत्त ने बच्चे-हाथी का अनुचित विश्वास किया। उसने बडे होने पर अपने को पोसनेवाले को ही मार डाला। ]