जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
कपि ] ४६३ शाला म आवे, दाखिल हो तो सब जगह पाखाना पेशाब करके और आग लगा कर खराब कर दे । यह कह कर बोधिसत्त्व ने जली लकड़ी ले उसे डरा भगाया । वह कूद कर वन म प्रवेश कर चला ही गया । फिर उस जगह नही गया । बोधिसत्त्व न अभिञ्जा और समापत्तियां प्राप्त कर तपस्वीकुमार को व सिन-परिकर्म सिखाया । उसने अभिञ्जा तथा समापत्तियां प्राप्त कीं । व दोनो ध्यान प्राप्त हो ब्रह्मलोक परायण हुए । शास्ता न 'न भिक्षुओ केवल अभी किन्तु पुरान समय से भी यह ढोगी ही हैं', कह यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यों के अन्त म कोई खोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी हुए । उस समय बन्दर ढोगी भिक्षु था । पुत्र राहुल । पिता तो मैं ही था ।
कपि ] ४६३ शाला म आवे, दाखिल हो तो सब जगह पाखाना पेशाब करके और आग लगा कर खराब कर दे । यह कह कर बोधिसत्त्व ने जली लकडी ले उसे डरा भगाया । वह कूद कर वन में प्रवेश कर चला ही गया । फिर उस जगह नहीं गया । बोधिसत्त्व ने अभिज्ञा और समापत्तियां प्राप्त कर तपस्वीकुमार को कसिन्-परिकर्म सिखाया । उसने अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कीं । वे दोनो ध्यान-प्राप्त हो ब्रह्मलोक परायण हुए । शास्ता ने 'न भिक्षुओ केवल अभी किन्तु पुराने समय से भी यह ढोगी ही हैं', कह यह धर्मदेशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यो के अन्त में कोई स्रोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी हुए । उस समय बन्दर ढोगी भिक्षु था । पुत्र राहुल । पिता तो मैं ही था ।