जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ सटीकजातकपारिजाते- वलोकिते, गुप्त्यां = कारागारे प्रसवो वाच्यः । यदि लग्ने कर्को वृश्चिको वा राशिर्भवति तत्र शनौ विद्यमाने चन्द्रदृष्टे च, अवटे = कुपथे (गर्त्ते ) प्रसवो वाच्य इति ॥ ६३ ॥ जलचरराशिलग्ने वर्त्तमानः शनिबुधेनावलोकितश्चेत्तदा क्रीडागृहे, सूर्येणावलोकित- स्तदा देवमन्दिरे, चन्द्रेणावलोकितस्तदोषरभूमौ प्रसवो भवतीति ॥ ६४ ॥ नृलग्नगं = पुरुषराशिलग्नगतं मन्दं (शनिं) कुजः = मङ्गलः प्रेक्ष्य ( विलोक्येति सर्व- त्रागुवर्त्तते ) श्मशानभूमौ, सितेन्दू = शुक्रचन्द्रौ रम्ये = रमणीयभूमौ, गुरुरग्निहोत्रे = हवनागारे, रविनंरेन्द्रामरगोकुलेषु = राजगृह देवालय गोष्ठे वा, ज्ञः = बुधः शिल्पालये = चित्रपुस्तकादिरचनागारे प्रसवं = जन्म करोति ॥ ६५ ॥ एतेषां योगानामभावे प्रसवदेशज्ञाने योगान्तरमाह-राश्यंशसमानगोचरे मार्गे चरे स्थिरे च गृहे जन्म वाच्यम् । एतदुक्तं भवति । यदि चरो वा स्थिरो राशिर्लग्नं भवति, तथा लग्ने नवांशोऽपि चरो वा स्थिरो भवति तदा तस्य राशेर्नवांशस्य वा यो गोचरः = सञ्चारमार्गस्तस्मिन्प्रदेशे जन्म वक्तव्यम् । अथ च सर्वेषां राशीनां लग्ने स्वक्षां- शगते = निजनवांशप्राप्तौ, स्वमन्दिरे = आत्मभवने जन्म वाच्यम् । अत्र यदुक्तं राश्यंश- समानगोचरे तत्किं लग्नराशिगोचर उत नवांशराशिगोचर इति सन्देहेन आह-'बलयोगात्फ- लमंशकार्क्षयोः' । लग्नराशिनवांशराश्योर्बलीयसोगोचरप्रदेशे जन्म वाच्यमिति ॥ ६६ ॥ पूर्ण चन्द्रमा कर्क राशिमें, बुध लग्नमें और बृहस्पति सुखभावमें हों तो जातकको नाव- पर उत्पन्न जाने । वा लग्न जलचर राशिका हो और चन्द्रमा सप्तम भावमें हो तो भी नावपर प्रसव जाने ॥ ६१ ॥ जन्मलग्नमें जलचर राशि और चन्द्रमा भी जलचर राशिका हो तो जलमें प्रसव जाने । लग्नको पूर्ण चन्द्रमा देखता हो तो भी जलमें प्रसव जाने । जलचर लग्नसे चन्द्रमा दशम वा चतुर्थ या प्रथममें हो तो भी वही फल जाने ॥ ६२ ॥ जन्मलग्न और चन्द्रमासे शनि १२ वें हो और उसको पापग्रह देखता हो तो कारागार (जेल) में जन्म जाने । वृश्चिक या कर्क राशिका लग्न हो, उसमें शनि हो और उसपर चन्द्रमाकी दृष्टि हो तो गढेमें जन्म जाने ॥ ६३ ॥ जलचर राशिका शनि लग्नमें हो, उसको बुध देखता हो तो क्रीड़ाभवन (रतिगृह) में जन्म जाने । सूर्य देखता हो तो देवमन्दिरमें जन्म जाने । इसी प्रकार शनिको चन्द्रमा देखे तो ऊसर भूमिमें जन्म जाने ॥ ६४ ॥ जन्मलग्न पुरुषराशि हो और उसमें शनिको मङ्गल देखता हो तो श्मशानमें जन्म जाने । शुक्र और चन्द्रमा देखें तो रमणीय घरमें जन्म, गुरु देखे तो अग्निहोत्रके घरमें, अथवा रसोईके घरमें जन्म, सूर्य देखता हो तो राजा अथवा देवताके घरमें वा गोशालामें जन्म, और बुध देखता हो तो शिल्पके घरमें जन्म जाने ॥ ६५ ॥ पूर्वमें जो प्रसव देशके ज्ञान कहे गये हैं, उनके अभावमें योगान्तर कहते हैं-चर और स्थिर राशिके लग्नमें लग्नकी राशि और नवांशकी राशिके सदृश भूमिमें जन्म कहना चाहिये (जिस राशिकी जो भूमि कही गयी है, उसी भूमिमें) । सभी राशिके लग्नमें यदि अपना नवांश विद्यमान हो तो अपने घरमें जन्म कहना । यहां राशिकी समान भूमि या नवांशकी भूमि कहनी चाहिये ? इस सन्देहमें उत्तर यह है कि राशि या नवांशमें जो बली हो उसी- की भूमि कहनी चाहिये । (सु० शा० कार) ॥ ६६ ॥ अथ मात्रा त्यक्तस्य दीर्घायुर्बुद्धम् । आरार्कजयस्त्रिकोणे चन्द्रेऽस्ते च विसृज्यतेऽम्बया । दृष्टेऽमरराजमन्त्रिणा दीर्घायुः सुखभाक् च स स्मृतः ॥ ६७ ॥ इदानीं मात्रा त्यक्तस्य योगं तस्य दीर्घायुर्बुद्धवाह । चन्द्रे मंगलशन्योरेकत्रस्थयो-