भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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वियोनिजन्माध्यायः ॥ ३ ॥ ८१ स्थिरराशौ स्थिरनवांशे च भवेत्तदा तद्व्रणादि सहजोत्पन्नं वाच्यम् । अन्यथा = अन्य- राश्यादौ चरादौ च केनचित्कारणेनागन्तुको व्रणादिको भवति । आगन्तुकस्य व्रणादेः ग्रह- वशान्निमित्तमुच्यते । मन्देऽश्मानिलज इत्यादिकं सरलार्थमेव ॥ ७८ ॥ अथ पूर्वप्रदर्शिते यस्मिन्भागे बुधसहिताः परे त्रयो ग्रहाः शुभाः पापा वा विद्यमाना भवन्ति तत्राङ्गे पूर्वोक्तस्य व्रणादेरवश्यमेव प्राप्तिर्भवति । तनोः षष्ठे भावे पापग्रहो देहे व्रणं करोति । कुत्रेत्युच्यते । अस्मदाश्रिते । स षष्ठो भावो यस्मिन्नङ्गे ( कालपुरुषस्य ) भवेत्तत्रैवे- ति । स षष्ठस्थः पापः शुभग्रहैर्दृष्टस्तदा तिलकमशकदूरुवति । सौम्यैर्युतस्तदा लक्ष्मवान् भवति = तस्मिन्नङ्गे चिह्नं भवतीत्यलम् ॥ ७९ ॥ उन पूर्वोक्त अङ्गोंमें जिस अङ्गमें पापग्रह हो उस अङ्गमें चोट या घाव करता है । यदि उस पापग्रहके साथ शुभग्रह भी हो या शुभग्रहसे देखा जाता हो तो तिला मासा आदि होवे । यदि वह व्रण ( घाव ) आदि के करनेवाला ग्रह अपनी राशि वा अपने नवांशमें हो, वा स्थिर राशि वा स्थिर राशिके अंशमें हो तो उस अंगमें घाव आदि चिह्न जन्मसे ही रहेगा । यदि ऐसा न हो तो वह चिह्न पीछे होगा । यदि चिह्न करनेवाला शनि हो तो पत्थर वा वायुसे, मंगल हो तो अग्निसे वा शस्त्रसे वा विषसे चिह्न होगा । बुध हो तो भूमिपर गिरने से, सूर्य हो तो काष्ठसे या चतुष्पदसे, चन्द्रमा हो तो सीङ्गवाले पशुसे या जलजन्तुसे व्रण आदि होते हैं । बृहस्पति और शुक्र व्रणकारक नहीं होते हैं, वे शुभ होते हैं ॥ ७८ ॥ वाम वा दक्षिण जिस भागमें बुधके सहित तीन ग्रह ( शुभ या पाप ) युत हों उस अङ्गपर अवश्य चिह्न कहे । उन ग्रहोंमें विशेष बलवान् ग्रहकी दशामें व्रण, चोट होगी । लग्न से छठे भावमें पापग्रह हो तो "कालात्मकस्य च शिरो" इसके अनुसार वह छठा भाव जिस अङ्गमें है उस पर घाव करेगा । वह षष्ठ-भावस्थित ग्रह शुभ ग्रहसे दृष्ट हो तो मशा करता है । यदि शुभ ग्रहसे युत हो तो उस अङ्गमें कोई अच्छा चिह्न करता है ॥ ७९ ॥ वियोनिजन्मविज्ञानं निषेकोदयजं फलम् । जन्मकालपरिज्ञानं यत्तदाचार्यभाषितम् ॥ ८० ॥ इति नवग्रहकृपया वैद्यनाथविरचिते जातकपारिजाते आधानजन्माध्यायस्तृतीयः ॥ ३ ॥ अथात्र तृतीयेऽध्याये वियोनिजन्मज्ञानम् , निषेकलग्नजं फलम् , तथा जन्मविधिपरि- ज्ञानमिति विषयत्रयं यदुल्लासते तत्सर्वमेवाचार्येण तत्र भवता वराहमिहिराचार्येण भाषितं वर्त्तते । तत्सर्वं सङ्ग्रहरूपेणात्र मया वैद्यनाथेन निवेशितमिति भावः ॥ ८० ॥ पारिजाते सुधा टीका कपिलेश्वररञ्जिता । जन्माख्ये च तृतीयेऽस्मिन्नध्याये पूर्णतां गता ॥३॥ इस ३ रे अध्यायमें जो वियोनिजन्मज्ञान, गर्भाधान का फल और जन्मके प्रकारोंके- ज्ञान हैं वे सब आचार्य वराहमिहिरने कहे हैं अर्थात् ये बातें बृहज्जातक की हैं ॥ ८० ॥ इति श्रीवैद्यनाथदैवज्ञविरचिते जातकपारिजाते तृतीयाध्याये 'विमला' हिन्दी टीका समाप्ता ॥ ३ ॥

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