भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

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अतः—लग्नांशलिप्तिका हत्वा प्रत्येकं विहगायुषा। भाज्या मण्डललिप्ताभिरिति कल्याणवर्मोक्तमप्युपपद्यते ॥ ११-१३ ॥ अब और संस्कार इसका इस प्रकार है कि—लग्नके जितने नवांश भुक्त हुए हों वे उदित नवांशके नामसे कहे जाते हैं। जिस नवांशमें जन्म है वह जितना भुक्त हुआ हो उसपरसे त्रैराशिक द्वारा जो फल मिले उसको उदित नवांशमें जोड़नेसे सार्द्धोदित उदित नवांश होता है इसकी कला करके लग्नमें यदि पापग्रह हैं तो इष्ट ग्रहकी दशापिंडसे गुणन कर उसमें १०८ का भाग देनेसे जो लब्धि मिले वह उस ग्रहके वर्षादिमें हीन करे यदि उस लग्नस्थित पापग्रहपर शुभग्रह की पूर्ण दृष्टि हो तो उस लब्ध फलका आधा ही घटावे। इस संस्कारमें ऐसा भी अर्थ कोई २ आचार्य करते हैं कि लग्नमें पापग्रह हों तो सार्द्धो- दित उदित नवांशसे सब ग्रहोंके आयुयोगको गुणे फिर उसमें १०८ का भाग देनेसे जो मिले उसे सम्पूर्ण पिंडमें घटावे यदि लग्नमें शुभग्रह हो तो उस लब्धि फलका आधा घटाने से जो बचे वह समस्त ग्रहोंकी दशा होती है। बाद दशाकी गणना से सब ग्रहोंकी दशा वर्षादि लेवे ॥ ११ ॥ लग्नके भुक्त अंशोंकी कला बनाकर उससे ग्रहोंकी अपनी २ आयुको अलग २ गुण दे और २१६०० से भाग दे, जो लब्धि मिले उसे ग्रहोंकी गणितागत आयुमें घटावे, शेष ग्रह की स्पष्टायु होती है। परन्तु यह क्रिया यदि पापग्रह लग्नमें हो तभी करनी चाहिये। यदि उस लग्नस्थित पापग्रहके ऊपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो ऊपर की क्रियासे जो वर्षादि लब्धि मिले उसका आधा ही ग्रहोंकी आयुमें घटाना चाहिये। परन्तु यह प्रकार अंशायुमें नहीं होता। पिण्डायुकी तरह निसर्गायुकी भी प्रक्रिया करनी चाहिये ॥ १२-१३ ॥ अथ लग्नायुःसाधनम्। आयुस्तथैतेषु बलाढ्यलग्ने विहाय राशीन् कृतलिप्तिकेऽत्र । भक्ते द्विशत्या फलमब्दपूर्व यत्स्याद्विलग्नायुषि तच्च योज्यम् ॥ १४ ॥ लग्नराशिसमाश्वाब्दास्तन्मासाद्यनुपाततः । लग्नायुर्द्वायमिच्छन्ति होराशास्त्रविशारदाः ॥ १५ ॥ अथाधुना लग्नायुः साध्यते । आयुस्तथैतेषु = यथा किल ग्रहाणामायुः साध्यते तथा एतेषु पिण्डादिषु लग्नस्याप्यायुः साध्यमिति भावः । तत्र बलाढ्यलग्ने स्वषड्बलेन सहिते लग्ने लग्नस्य राशीन् विहाय भुक्तभागानां कृतलिप्तिके = कलीकृतेऽत्र द्विशत्या भक्त अब्द- पूर्वं वर्षार्थं फलं यत्स्यात् तच्च लग्नायुषि लग्नायुर्दाये योज्यं वाच्यमित्यर्थः । लग्नस्य पिण्डायुर्मानं यथा ग्रहाणामुक्तं तथा नोक्तम् "होरात्वंशप्रतिममपरे राशितुल्यं वदन्तीति" श्रवणात् । अत्र लग्नस्य भुक्तभागाः कलीकृताः शतद्वयेन विभक्ता नवांशा लभ्यन्तेऽतो लग्ने नवांशतुल्यमेवायुर्वर्षार्यामिति होरात्वंशप्रतिमं सङ्गच्छते । अथापरे राशितुल्यं वद- न्तीति द्योत्यते । लग्नेन यावन्तो राशयो मेषादयो भुक्तास्तावन्ति वर्षाणि, तथाऽनुपातत- स्तनमासादिः लग्नायुर्दायो भवति । तत्र मासाद्यर्थमनुपातो यथा यद्यष्टादशशतकलाभिर्द्वा- दशमासास्तदा लग्नस्य भुक्तकलाभिः क इति लब्धं मासादि राशितुल्यवर्षे संयोज्य लग्ना- युर्ज्ञेयम् । अथात्र केशवेन । "स्याल्लिप्ताः खनखोद्धृता विभतनोर्वर्षादि पैण्ड्यत्रिके लग्नायुर्निखिलाँस्तदंशकसमं कैश्चिद्भतुल्यं स्मृतम् । यस्येशोऽधिवलस्तदेन हि परैस्तेनान्त्यमन्येऽदं शायुर्वत् त्वय चांशतुल्यमखिलोकं ग्राह्यमेवादिरुम्" ॥ इत्युक्तत्वाद्ब्रह्मांशतुल्यमेव लग्नस्यायुर्ग्राह्यमिति ममापि मतम् ॥ १४-१५ ॥