जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजातकभङ्गाध्यायः ॥६॥ १८१ चन्द्रमा, गुरु और शुक्र केन्द्र या त्रिकोणस्थ होकर सन्धिगत होवें तथा लग्न स्थिर राशिका हो तो जातक प्रेष्य होता है ॥ ४१ ॥ सन्धिस्थ बृहस्पति ऐरावत अंशमें हो, चन्द्रमा उत्तम वर्गमें होकर केन्द्रके बाहर हो, कृष्णपक्षकी रात्रिमें जन्म हो, शुक्र लग्नमें हो तो दूसरेका कार्य करके जीवे ॥ ४२ ॥ मङ्गल, बृहस्पति और सूर्य षष्ठ, चतुर्थ और दशमभावकी सन्धिमें स्थित हों, चन्द्रमा पापांशकमें हो, शुभ राशिमें बृहस्पति लग्नेशसे युक्त हो तो दूसरेका कार्य करनेवाला होवे । बृहस्पति मकरमें होकर शत्रुभाव, अष्टम या द्वादशमें हो, चन्द्रमा लग्नसे चतुर्थमें हो तो वह जातक नित्य दूसरेका कार्य करनेवाला होवे । (सु० शा० कार) ॥ ४४ ॥ अथ प्रेष्ययोगफलम् । पापात्मा कलहप्रियः कठिनवाग् भूदेवतादूषको विद्याभाग्यविहीनदुष्टरसिको मात्सर्यकोपान्वितः । मिथ्यावादविनोदवञ्चनरतः शिश्नोदरे तत्परः कारुण्यास्थिरमानभङ्गिचतुरो योगे परप्रेष्यके ॥ ४५ ॥ इदानीं पूर्वोक्तानां प्रेष्ययोगानां सामान्येन फलमनेन श्लोकेन सरलार्थकेनोच्यते । पापात्मेति ॥ ४५ ॥ प्रेष्ययोगमें उत्पन्न मनुष्य पापात्मा, कलहप्रिय, कटुभाषी, ब्राह्मणनिन्दक, विद्या-भाग्य- हीन, दुष्ट, रसिक, डाह-क्रोधसे युक्त, मिथ्यावादी, ठगौतीमें लीन, पेट भरने और रंडीबाजी करनेमें तत्पर, कारुणीक, चल चित्त और अपमान सहनेमें चतुर होता है ॥ ४५ ॥ अथ अङ्गहीनयोगाः । मेषे वृषे चापधरे विलग्ने विकारदन्तो यदि पापट्टष्टे । मन्दे मदस्थेऽहियुते कुजे वा बलैर्विहीनेऽङ्गविहीननेवान् स्यात् ॥ ४६ ॥ मेषे, वा वृषे, वा चापधरे=धनुषि विलग्ने = जन्मलग्ने, तस्मिन् यदि पापट्टष्टे = पाप- ग्रहेण केनचिदवलोकिते जातो विकारदन्तो विकृतदशनो भवेत् । अथ मन्दे=शनौ, वा अहियुते = राहुसहिते कुजे ( कुजराहू ) मदस्थे = सप्तमभावगते बलैर्विहीने = निर्बले च जातोऽङ्गविहीनवान् स्यात् । एतद्योगे जातस्य कश्चिदङ्गो हीनः स्यादित्यर्थः ॥ ४६ ॥ मेष, वृष वा धनु लग्नमें जन्म हो उसे पापग्रह देखता हो तो जातकके दांतमें विकार हो । शनि सप्तममें हो या मङ्गल राहुके साथ निर्बल होकर ९ वें में हो तो अङ्गहीन होवे॥४६॥ लग्नाद्दशमगश्चन्द्रः सप्तमस्थो धरासुतः । द्वितीयस्थानगो 'भानुरङ्गहीनो भवेन्नरः ॥ ४७ ॥ चन्द्रमा लग्नसे दशवेंमें हो, मङ्गल सप्तममें हो, सूर्य दूसरे भावमें हो तो मनुष्य अङ्ग हीन होवे ॥ ४७ ॥ उ. ४६ श्लो. ( १ ) उ. ४७ श्लो. ( २ )
कुण्डली चक्र (Charts):
चक्र ( १ ) [उ. ४६ श्लो.]:
- लग्न (प्रथम भाव): १ ल.
- सप्तम भाव: श.
- दशम भाव: मं
चक्र ( २ ) [उ. ४७ श्लो.]:
- लग्न (प्रथम भाव): ल.
- द्वितीय भाव: सू.
- सप्तम भाव: मं.
- दशम भाव: चं
१६ जा०