जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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जातकमङ्गाध्यायः ॥ ६ ॥ १६३ श्लोकेनानेनोन्मादभाक्कलहप्रिययोगमाह— चन्द्रे सपापे फणिनाथयुक्ते रिःफे सुते रन्ध्रगतेऽथवाऽपि । उन्मादभाक् तत्र सरोषयुक्तो जातस्तु नित्यं कलहप्रियः स्यात् ॥ ८३ ॥
| ल. | चं. रा. मं. | |
| चं.रा.<br>मं. | ||
| चं. रा. मं. | ||
| चन्द्र इति । सरलार्थः ॥ ८३ ॥ | ||
| चन्द्रमा पापग्रहके साथ राहुसे युक्त होकर १२ वें, वा ५ वें, वा ८ वें हो तो वह उन्मादी, क्रोधी और नित्य कलहप्रिय होवे ॥ ८३ ॥ | ||
| **इदानीं दन्ताक्षिरोग |