भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

राजयोगाध्यायः ॥७॥ २२३ मालव्य-चारुशशेति योगकरा भवन्ति । अर्थात् बलवान् भौमो मूलत्रिकोणोच्चगृहं गतः केन्द्रवर्ती स्यात्तदा रुचको योगः स्यात् । तथाभूतेन बुधेन भद्रयोगः । एवं गुरुणा हंस- योगः । शुक्रेण मालव्ययोगः । शनिना चारुशशयोगो वाच्य इति । तथा च जातकाभरणे— “स्वगेहतुङ्गाश्रयकेन्द्रसंस्थैरुच्चोपगैर्वावनिसूनुमुख्यैः । क्रमेण योगा रुचकाख्य-भद्र-हंसाख्य-मालव्य-शशाभिधानाः ॥ इति ॥५६॥ यदि बलवान् मंगल मूलत्रिकोण, स्वगृह, उच्चगृहमें प्राप्त होकर केन्द्रमें स्थित हो तो “रुचक” योग होता है । बुध हो तो “भद्र” योग होता है । बृहस्पति हो तो “हंस” योग होता है । शुक्र हो तो “मालव्य” योग होता है और शनि हो तो “शश” योग होता है ॥५९॥ अथ रुचक-योगफलम् । जातः श्रीरुचके बलान्वितवपुः श्रीकीर्तिशैलान्वितः शास्त्री मन्त्रजपाभिचारकुशलो राजाऽथवा तत्समः । लावण्‍यारुणकान्तिकामलतनुस्त्यागी जितारिर्धनी सप्तत्यैब्दमितायुषा सह सुखी सेनातुरङ्गाधिपः ॥ ६० ॥ श्लोकेनानेन रुचकयोगे जातानां फल- मुच्यते—जात इति । सरलार्थः ॥ ६० ॥ रुचक योगमें उत्पन्न होने वाला मनुष्य बलयुक्त शरीरवाला, कीर्ति और शीलसे युक्त, शास्त्री, मंत्रके जप और अभिचारमें कुशल, राजा, वा उसके सदृश धनी, सौन्दर्ययुक्त लाल कान्ति, कोमल शरीर, त्यागी, शत्रु- जित् , धनी और ७० वर्षकी आयु तक सुखी, सेना और घोड़ोंसे युक्त होता है ॥ ६० ॥

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|       \    मं. ल.   /       |
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|   १२    >    ।.   <    ८    |
|        /  रुचकयोगः \        |
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धर्मेशालाभेशधनेश्वराणामेकोऽपि शीतद्युतिकेन्द्रवर्ती । स्वयं च लाभाधिपतिर्गुरुश्चेदखण्डसाम्राज्यपतित्वमेति ॥ ६१ ॥ धर्मेशेति । धर्मेश-लाभेश-धनेश्वराणां= नवमेशैकादशेशद्वितीयेशप्रहाणां मध्ये एकः अपि कश्चित्, शीतद्युतेश्चन्द्रात् केन्द्रवर्ती (चन्द्रतः १।४।७।१० भवने) भवेत् , गुरुः= बृहस्पतिश्चेद्यदि लाभाधिपतिः=एकादशभावे- शो भवेत्तदा जातः स्वयं स्वपराक्रमेणाख- ण्डसाम्राज्यपतित्वमेति=चक्रवर्तित्वं प्राप्नोति ॥

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|      \       ११      /      |
|  १२   \   ल. चं.    /   १०  |
|        \           /        |
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|    १    |         |    ९    |
|         | अखण्ड-  |         |
|---------| साम्राज्य |---------|
|  २ बृ.  |  पतिः   |    ८    |
|         |         |         |
|---------+---------+---------|
|        /     ५     \        |
|   ३   /             \   ७   |
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|     /                 \  ६  |
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नवमेश, लाभेश, धनेश, उनमें एक भी चन्द्रमासे केन्द्रमें हो और लाभाधिपति खास बृहस्पति हो तो जातकको अखंड राज्यका पति बनावे ॥ ६१ ॥ अथ भद्रयोगफलम् । शार्दूलप्रतिमाननो गजगतिः पीनोरुवक्षःस्थलो लम्बापीनसुवृत्तबाहुयुगलस्तत्तुल्यमानोच्च्छ्रयः । मानी बन्धुजनोपकारनिपुणः श्रीभद्रयोगोद्भवो राजाऽशीतिमितायुरेति विपुलप्रज्ञायशोवित्तवान् ॥ ६२ ॥ 16