जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजयोगाध्यायः ॥७॥ २२६ विधुन्तुदादिग्रहपीडितेन्दौ पापेक्षते चाशु दरिद्रमेति । लग्नाच्चतुष्केन्द्रगृहे सपापे निशाकराद्वाऽऽशु दरिद्रमेति ॥ ७५ ॥ विधुन्तुदादीति । विधुन्तुदादिभिर्ग्रहैः = राहादिपापग्रहैः पीडिते, इन्दौ=चन्द्रे पापेक्षिते च जात आशु = शीघ्रमेव दरिद्रयोगमेति । लग्नादिति । लग्नात् चतुष्केन्द्र-( १।४।७।१० ) गृहे, वा निशाकरात् = चन्द्रात् चतुष्केन्द्रगृहे = चतुर्षु केन्द्रेषु सपापे = पापग्रहयुक्ते जातो नर आशु दरिद्रमेति ॥ ७५ ॥ राहु आदि उपग्रहसे निपीडित चन्द्रमा पापग्रहसे देखा जाता हो तो जल्द दरिद्र बनता है । लग्नसे वा चन्द्रसे चारों केन्द्रोंमें पापग्रह हों तो भी जल्द दरिद्र बनावै ॥ ७५ ॥ चन्द्रे पराजितशुभग्रहदृष्टियुक्ते राहादिपीडिततनौ तु दरिद्र एव । नीचारिवीक्षणयुते रिपुराशिवर्गे च