जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ सटीकजातकपारिजाते- त्रिंशत्स्वरूपाः ( ३१ ) सुनफानफाख्याः षष्टित्रयं ( १८० ) दौरुधरे प्रभेदाः । इच्छाविकल्पैः क्रमशःऽभिनीया नीते निवृत्तिः पुनरन्यनीतिः ॥ इति ॥ ७३ ॥ Notes—अत्रोक्तसुनफादिप्रभेदानां विवरणं अग्रे ( ८३ श्लोके, भाषाचक्रेषु ) द्रष्टव्यम् । [चक्र १ (सुनफा): द्वितीय भाव में मं., लग्न में चं.] [चक्र २ (अनफा): द्वादश भाव में बु., लग्न में चं.] [चक्र ३ (दुरधुरा): द्वितीय में मं., लग्न में चं., द्वादश में बु.] [चक्र ४ (केमद्रुमः): लग्न में चं.] यदि लग्नमें या सप्तममें चन्द्रमा हो उसे बृहस्पति न देखता हो तो 'केमद्रुम' योग होता है । ग्रह यदि अष्टक वर्गमें अल्प बिंदुके हों और विकल हों तो केमद्रुम योगके फल देनेवाले होते हैं ॥ ७१ ॥ सूर्यके अतिरिक्त ग्रह चन्द्रमाके दूसरे और बारहवें स्थानोंमें हो तो “सुनफा” “अनफा” ‘धुरन्धरा’ योग होते हैं । वे तीनों योग न हों तो केमद्रुम योग होता है, अर्थात् चन्द्रमासे दूसरे सूर्यके अतिरिक्त ग्रह हों तो सुनफा, बारहवें हों तो अनफा, दोनों जगह ( २।१२ ) ग्रह हों तो धुरन्धरा योग होते हैं। यदि चन्द्रमासे दूसरे, बारहवें कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम ( दरिद्र फलद ) योग होता है ॥ ७२-७३ ॥ इदानीमन्येऽपि केमद्रुमफलदा दरिद्रयोगा उच्यन्ते— चन्द्रे समानौ यदि नीचदृष्टे पापांशके याति दरिद्रयोगम् । क्षीणेन्दुलग्नान्निधने निशायां पापेक्षिते पापयुते तथा स्यात् ॥ ७४ ॥ चन्द्रेति । समानौ = सूर्यसहिते, चन्द्रे नीचगतग्रहेण दृष्टे, पापांशके = पापग्रहनवांशे विद्यमाने सति दरिद्रयोगं ( केमद्रुमतुल्यं ) याति = प्राप्नोति जातक इति । क्षीणेन्द्विति । निशायां = रात्रिसमये जन्मनि क्षीणेन्दुलग्नात्-क्षयिष्णु-( कृष्णपक्षीय ) चन्द्रगतलग्नात् , निधने = अष्टमे भावे, पापेक्षिते = पापग्रहेण दृष्टे, पापग्रहेण युते च तथा स्यादर्थाद् दरि- द्रयोगः स्यादिति ॥ ७४ ॥ चन्द्रमा सूर्यके साथ नीच गत ग्रहसे दृष्ट पापांशक में हो तो दरिद्र योग होता है। रातके जन्ममें लग्नगत क्षीण चन्द्रमासे ८ वें पापग्रहकी दृष्टि हो, या पापग्रह बैठा हो तो दरिद्रयोग होता है ॥ ७४ ॥