जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 257, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ेंा, द (da), श (śa) with ai-matra and repha = शैर् (śair) ! Wait! Is there a repha? द्वा-द-शै-र-न-फा: द्वादशैः + अनफा = द्वादशैरनफा! Yes, exactly द् (d) + वा (vā) + द (da) + शै (śai) + र (ra) + न (na) + फा (phā) = द्वादशैरनफा! Then: ज्ञे (jñe) + यो (yo) = ज्ञेयो. Then: ग्रहैर् (grahair) Then: विद्वान्द्वयस्थितैः (vidvāndvayasthitaiḥ) or विद्वन्द्वयस्थितैः: Look at the characters: वि (vi) द्वा (dvā) with anusvara or न्? It is विद्वान् (vidvān) followed by द्वयस्थितैः: "ग्रहैर्विद्वान्द्वयस्थितैः ।" Then: "प्रोक्तो दुरुधुरा योगोऽन्यथा केमद्रुमः स्मृतः ॥"
Everything is very consistent and clear now. I will produce the output directly as requested.लग्नमें हो शुभ ग्रहसे युत हो, या १० वें भावमें उच्चका हो उसे गुरु देखता हो तो दरिद्र नहीं होता है । ( सु. शा. कार ) ॥ ८१