भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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राजयोगाध्यायः ॥ ७ ॥ २३० स्वोच्चस्वमित्रभवनोपगतेषु सर्वं प्राप्नोति जातमनुजो नियतं यदुक्तम् । स्वांशेषु वा निजसुहृद्गृहसंयुतेषु प्राहुस्तथैव फलमस्ति पराशराद्याः ॥ १०६ ॥ चन्द्रः सराहुर्यदि वा सकेतुश्चन्द्राद्द्विर्वा यदि रिःफयातः । नीचास्तगो वा यदि योगकर्ता जातस्य मिश्रं फलमाहुरायाः ॥ १०७ ॥ इदानीं द्वादशभिः श्लोकैः दुरुधुरायोगफलान्युच्यन्ते । अत्रोक्ताद्विशेषग्रहयोगेऽपि तार- तम्येन फलं वाच्यम् । श्लोकार्थ स्पष्टार्था एवेति ॥ ९६-१०७ ॥ जिसके जन्म-समय बुध और मंगलके मध्यमें चन्द्रमा हो वह असत्यवादी, गुणवान् , निपुण, भारी शठ, दयायुक्त, लोभी और वृद्धा स्त्रीमें आसक्त होता है ॥ ९६ ॥ जिसके जन्मसमय मंगल और बृहस्पतिके मध्यमें चन्द्रमा हो वह स्वकर्मसे धनी, यशस्वी, शत्रुओंसे पीड़ित, और सदा अपने घरमें रहनेवाला होता है ॥ ९७ ॥ जिसके जन्म-समय मंगल और शुक्रके मध्यमें चन्द्रमा हो वह व्यायामी, देखनेमें सुन्दर, कामुक, क्रूर-स्वभाव, हृष्ट, धनी, और भयसे शीलरहित ( पागल की तरह ) होता है ॥ ९७ ॥ जिसके जन्म-समय मंगल और शनिके मध्यमें चन्द्रमा हो वह निन्दित-स्त्रीरत, क्रोधी, धनवान्, चुगलखोर, शत्रुवाला और अधीर होता है ॥ ९९ ॥ जिस मनुष्यके जन्म-समय बुध और बृहस्पतिके मध्यमें चन्द्रमा हो वह धर्मात्मा, शास्त्र जाननेवाला, वाचाल, श्रेष्ठकवि, सज्जनोंसे युक्त और यशस्वी होता है ॥ १०० ॥ जिस मनुष्यके जन्म-समय बुध और शुक्रके मध्यमें चन्द्रमा हो वह नाच गानमें मग्न, सुन्दर रूपवाला, प्रियवक्ता, सुन्दर शरीर, सुन्दरबुद्धि और साहसी प्रकृतिवाला होता है ॥ जिस मनुष्यके जन्मके समय शनि और बुधके बीचमें चन्द्रमा हो वह अनेक देश में जाकर पूज्य हो, विशेष विद्या तथा धनसे युक्त न हो और अपने बन्धुजनोंका बैरी हो ॥१०२॥ जिस मनुष्यके जन्म-समय गुरु और शुक्रके बीचमें चन्द्रमा हो वह राजाके सदृश होता है और वह मनुष्य श्रीमान्, नीतिज्ञ, पराक्रमी, विख्यात और शुद्ध चित्तवाला होता है ॥ जिस मनुष्यके जन्म-समय शनि और बृहस्पतिके बीचमें चन्द्रमा हो वह सुखी, विन- यविज्ञान-विद्या-रूप और गुणोंसे युक्त, धनी और दूसरोंको शान्ति करनेवाला होता है ॥ जिस मनुष्यके जन्म-समय शुक्र और शनिके मध्यमें चन्द्रमा हो वह वृद्धोंके आचारों से युक्त, कुलीन, गुणहीन-स्त्रीका स्वामी, धनी, और राजप्रिय होता है ॥ १०५ ॥ जो ये फल कहे हैं वे योगकारक ग्रह यदि उच्चके हों, स्वगृहमें हों, अपने नवांश या अपने मित्रगृह के हों तो नियत सब फल होते हैं, यह पराशरादि ऋषियोंने कहा है ॥१०६॥ चन्द्रमा राहु वा केतुसे युक्त हो, वा चन्द्रमासे १२ वें राहु हो या दुरुधुरा योग कारक ग्रह नीच वा अस्तङ्गत हों तो मिश्र फल होता है ऐसा श्रेष्ठ विद्वानोंने कहा है ॥ १०७ ॥ अथ शकटयोगः । षष्ठाष्टमगतश्चन्द्रात्सुरराजपुरोहितः। केन्द्रादन्यगतो लग्नाद्योगःशकटसंज्ञितः॥११०८॥


[कुंडली चक्र]

  • प्रथम भाव (लग्न): ल.
  • द्वादश भाव: चं.
  • अष्टम भाव: गु.
  • दशम भाव: शकट-योगः

इदानीं शकटयोगमाह-षष्ठेति । च- न्द्रात्षष्ठे वा अष्टमे गुरुश्चेद्भववेत्तयादसौ गु- रुः लग्नात् केन्द्रेतरेऽर्थात् केन्द्रे न भवेत् तदा शकटसंज्ञो योगो भवति । तथा फलदीपिकायाम्— "जीवाद्व्ययारिसंस्थे शशिनि तु शकटः केन्द्रगे नास्ति लग्नात्" इति ॥१०८॥ चन्द्रमासे छठे वा आठवें बृहस्पति हो, लग्नसे केन्द्रमें न हो तो 'शकट' संज्ञक योग होता है ॥ १०८ ॥