जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ सटीकजातकपारिजाते-- मङ्गल अपनी राशि (मे. वृश्चि.) में हो तो राजासे, कृषि क्रियासे, यात्रासे धन प्राप्त होवे । शुक्रके गृह (वृ. तु.) में हो तो कामवृद्धि हो । बुधके गृह (मि. कं.) में हो तो दीन वचन बोलने वाला, कर्कमें राजप्रिय, धनवान्, सिंहमें हो तो निर्भय धनी होवे । बृहस्पति की राशि (ध. मी.) में होतो शत्रुजित, सुखी, कुम्भमें हो तो दुर्जनसेवित, मकरमें हो तो राजा वा राजाके सदृश होता है ॥ ४० ॥ बुध मङ्गलकी राशि (१. ८.) में होतो दरिद्र, शुक्रके गृहमें (वृ. तु.) में विद्वान्, मिथुन में सुखी, कर्कमें निज धनका नाशक, सिंहमें अपनी स्त्रीसे पराजित, कन्यामें हो तो सुन्दर- गुणका खान, भयरहित, धनुमें हो तो राजा का प्रिय, मीनमें हो तो लेखकसे पराजित और शनिके गृहमें हो तो शिल्पी (कारीगर) और दूत होता है ॥ ४१ ॥ बृहस्पति मङ्गलके गृह (१. ८.) में हो तो अधिक सेना-वित्त-सुतसे युत हो, गुणी तथा दाता हो । शुक्रके गृहमें (वृ.तु.) में हो तो तेजस्वी हो, बुधके गृह (मि. कन्या) में हो तो परिच्छद-सुहृद्-युत हो, कर्कमें हो तो बुद्धिमान्, पुत्र-धनी, कुम्भमें भोगी, सिंहमें यशस्वी और अपने गृह (ध. मी.) में राजा या राजाके सदृश हो और नीच (मकर) में हो तो घूमनेवाला, क्लेश बुद्धिवाला होवे ॥ ४२ ॥ शुक्र मेषादि राशिमें स्थित हो तो छिनार, वृषमें हो तो धन-बुद्धि-मित्र-बन्धु वाला हो, मिथुनमें हो तो विद्या-धन-ज्ञानवान्, कर्कमें हो तो डरपोक, सिंहमें हो तो अल्पपुत्र, कन्यामें हो तो अति नीच आचारवाला, तुलामें हो तो राजप्रिय, वृश्चिकमें हो तो दुष्ट स्त्रीगणोंसे सेवित, धनुमें हो तो जनोंका स्वामी, मकरमें हो तो भोगी, कुम्भमें हो तो कुमारी कन्यासे भोग करनेवाला, मीनमें हो तो श्री-विद्या-गुण-शीलवान् होवे ॥ ४३ ॥ मेषादि राशिस्थ शनिका फल-मेष राशिमें शनि हो तो मूर्ख, वृषमें हो तो अल्पधनी, मिथुनमें हो तो धन-पुत्र-बुद्धिसे हीन, कर्कमें हो तो मातृसुखसे रहित, सिंहमें हो तो स्त्रीके अनुकूल, कन्यामें होतो थोड़ा धन-पुत्र, तुलामें होतो गुणाग्रणी, पुर तथा ग्राममें मुखिया, वृश्चिकमें उग्र बुद्धिवाला, धनुमें पुत्र कलत्र-धन-विभवयुक्त, मकरमें राजप्रिय कुम्भमें धनवान्, मीनमें तेज आदि गुणसे बड़ा होवे ॥ ४४ ॥ चन्द्रमाके मेषादि राशिमें जो फल कहे हैं वे तथा यहां नवांशका फल विचार कर पण्डित कहें ॥ ४५ ॥ अथ दृष्टिफलम्- पापेक्षिते गगनगामिनि दुष्टरोगी जातः स्वधर्मगुणवित्तयशोविहीनः । पापन्विते तु परवित्तवधूविलोलोः पारुष्यावाक्पटुबुद्धियुतोऽलसः स्यात् ॥ ४६ ॥ यदि शुभकरदृष्टे खेचरे जातमर्त्यः सुतधनयुतभोगी सुन्दरो राजपूज्यः । परिभवरहितः स्यात्सौम्यखेटोपयाते जितरिपुरिह धर्माचारवानिङ्गितज्ञः॥४७॥ इदानीं दृष्टिफलमुच्यते । गगनगामिनि=ग्रहे (अत्र ग्रहशब्देन कारकग्रहोऽवगन्तव्यः) पापेक्षिते = पापग्रहेणावलोकिते, शेषं स्पष्टार्थमेवेत्यलं विस्तरेण ॥ ४६-४७ ॥ कारक ग्रह पापग्रहसे यदि देखा जाता हो तो दुष्ट-रोगी, अपने धर्म-गुण-धन-यशसे हीन होवे । पापग्रहसे युक्त हो तो परायेका धन-स्त्री भोगनेवाला,