जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ सटीकजातकपारिजाते- दृष्टि हो तो राजा, बृहस्पतिकी दृष्टि हो तो सोनार, शुक्रकी दृष्टि हो तो वैश्य हो । मंगल सूर्य-शनिकी दृष्टि हो तो ठग होता है । चन्द्रमा वृश्चिक राशिमें हो, उसपर बुधादि ग्रह की दृष्टि होनेसे फल-बुधकी दृष्टि हो तो दोमाता-वाला, बृहस्पतिकी दृष्टि हो तो राज- प्रिय, शुक्रकी दृष्टिवाला नीचकर्मा, शनिकी दृष्टिसे रोगी हो, सूर्यकी दृष्टिसे दरिद्र, और मंगलकी दृष्टिसे राजाका मन्त्री होवे ॥ ५० ॥ चन्द्रमा धनुराशिमें हो शुभ ग्रहसे दृष्ट युत हो तो जातक विद्या-धन-ज्ञान-चक्षसे बली हो, मङ्गल-सूर्य-शनिकी दृष्टि हो तो सभा-शठ, वेश्याओंसे विहार करनेवाला होवे ॥ मकर राशिके चन्द्रमापर बुधादि ग्रहकी दृष्टि होनेसे इस प्रकार फल है-बुधकी दृष्टि हो तो राजा, बृहस्पतिकी दृष्टि हो तो राजा, शुक्रकी दृष्टि हो तो विद्वान्, शनिकी दृष्टिमें धनी, सूर्यकी दृष्टि हो तो दरिद्र, मङ्गलकी दृष्टि हो तो विभु ( व्यापक ) होता है ॥ ५२ ॥ कुम्भ राशिमें चन्द्रमा स्थित हो उसे शुभ ग्रह देखते हों तो जातक यश-धनसे युक्त हो, और पापग्रह देखते हों तो दूसरेकी स्त्रीसे रमण करे ॥ ५३ ॥ मीन राशिमें चन्द्रमा हो शुभग्रह उसे देखते हों तो हास्यप्रिय, राजा, या विद्वान् हो, पापग्रह देखते हों तो कठोर वचनवाला तथा पापात्मा होवे । पापांशकमें चन्द्रमाको पापग्रह देखते हों तो शठ बुद्धि हो और दूसरेकी स्त्रीसे भोग करे । चन्द्रमा शुभांशमें हो और शुभग्रह देखते हों तो जातक यशस्वी हो ॥ ५४ ॥ राशि दृष्टिका जो फल वही नवांशकमें भी योजना करे। शुभग्रहकी दृष्टिसे वा योगसे सब शुभ प्रद होते हैं ॥ ५५ ॥ अथ लग्नादिभावगतग्रहफलम् । मार्तण्डो यदि लग्नगोऽल्पतनयो जातः सुखी निर्घृणः स्वल्पाशी विकलेक्षणो रणतलश्लाघी सुशीलो नटः । ज्ञानाचाररतः सुलोचनयशःस्वातन्त्र्यकस्तूत्तुङ्गे' मीने स्त्रीजनसेवितो हरिर्गते रात्र्यन्धको वीर्यवान् ॥ ५६ ॥ क्षीणे शशिन्युदयगे बधिरोऽङ्गहीनः प्रेष्यश्च पापसहिते तु गतायुरेव । स्वोच्चर्क्षगे धनयशोबहुरूपशाली पूर्णे तनौ यदि चिरायुरुपैति विद्वान् ॥५७॥ क्रूरः साहसिकोऽटनोऽतिचपलो रोगी कुजे लग्नगे विद्यावित्ततपःस्वधर्मनिरतो लग्नस्थिते बोधने । जीवे लग्नगते चिरायुरमलज्ञानी धनी रूपवान् कामी कान्तवपुः सदारतनयो विद्वान् विलग्ने भृगौ ॥ ५८ ॥ दुर्नासिको वृद्धकलत्ररोगी मन्दे विलग्नोपगतेऽङ्गहीनः । महीपतुल्यः सुगुणाभिरामो जातः स्वतुङ्गोपगते चिरायुः ॥ ५६ ॥ क्रूरो दयाधर्मविहीनशीलो राहौ विलग्नोपगते तु रोगी । केतौ विलग्ने सरुजोऽतिलुब्धः सौम्येक्षिते राजसमानभोगी ॥६०॥ रविंर्क्षेत्रोदये राहू राजभोगाय सम्पदि । स्थिरार्थपुत्रान् कुरुते मंदिर्क्षेत्रोदये शिखी ॥ ६१ ॥ इदानीं भाव रस्त्वेन ग्रहाणां फलानि विवक्षुः प्रथमं लग्नगतग्रहफलान्युच्यन्ते । श्लोकाः सरलार्था एव ॥ ५६-६१ ॥ यदि जन्मलग्नमें सूर्य हो तो थोड़े पुत्रवाला, सुखी, निर्दयी, अल्पभोजी, विकलनेत्र, रणकी इच्छा रखनेवाला, सुशील, नाट्य करनेवाला हो, लग्नमें यदि उच्च राशिका सूर्य हो तो ज्ञानाचारमें रत, सुन्दर नेत्र, तथा यशस्वी और स्वतन्त्र हो । मीनमें स्त्रीजनसे सेवित हो सिंहका सूर्य लग्नमें हो तो रात्र्यन्ध तथा वीर्यवान् होवे ॥ ५६ ॥