भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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द्वचादिग्रहयोगाध्यायः ॥८॥ २७५ क्षीण चन्द्रमा लग्नमें हो तो बधिर, अङ्गहीन हो। पापग्रहसे युक्त हो तो दूत और अल्पायु होवे। अपनी उच्च राशिका हो तो धनी यशस्वी, बहुत रूपवान् हो। यदि पूर्ण चन्द्रमा लग्नमें हो तो दीर्घायु और विद्वान् हो ॥ ५७ ॥ मङ्गल लग्नमें हो तो क्रूर, साहसी, घूमनेवाला, अत्यन्त चपल और रोगी हो। बुध लग्नमें हो तो विद्या, धन, तपसे युक्त, धर्मात्मा हो। बृहस्पति लग्नमें हो तो बड़ी आयु- वाला, स्वच्छ-ज्ञानी, धनी और रूपवान् हो। शुक्र लग्नमें हो तो कामी, सुन्दर शरीर, स्त्री- पुत्रसे युक्त, और विद्वान् हो ॥ ५८ ॥ शनि लग्नमें हो तो दुर्नासिका, वृद्धाक्षीवाला, रोगी और अङ्गहीन हो। यदि शनि अपने उच्च स्थानमें हो तो राजाके समान, सुन्दर गुणवाला हो ॥ ५९ ॥ राहु लग्नमें हो तो क्रूर, दया-धर्म-हीन, शीलवान् और रोगी हो। केतु लग्नमें हो तो रोगसे युक्त, लोभी हो। शुभग्रह देखते हों तो राज-समान भोगी हो ॥ ६० ॥ सूर्यके गृहमें होकर लग्नमें राहु हो तो जल्द राज-भोग प्राप्त करता है। शनिके गृहमें केतु लग्नमें हो तो स्थिर-धन-पुत्रको देता है ॥ ६१ ॥ अथ द्वितीयस्थग्रहफलम् । त्यागी धातुद्रव्यवानिष्टशत्रुर्वाग्मी वित्तस्थानगे चित्रभानौ । कामी कान्तश्चारुवागिङ्गितज्ञो विद्याशीलो वित्तवान् वित्तगेन्दौ ॥ ६२ ॥ धातोर्वादात्कृषिक्रियाटनपरः कोपी कुजे वित्तगे बुद्ध्योपार्जितवित्तशीलगुणवान् साधुः कुटुम्बे बुधे । वाग्मी भोजनसौख्यवित्तविपुलस्त्यागी धनस्थे गुरौ विद्याकामकलाविलासधनवान्वित्तस्थिते भार्गवे ॥ ६३ ॥ असत्यवादी चपलोऽटनोऽधनः शनौ कुटुम्बोपगते तु वञ्चकः । विरोधवान्वित्तगते विधुन्तुदे जनापराधी शिखिनि द्वितीयेगे ॥ ६४ ॥ अत्र त्रिभिः श्लोकैर्द्वितीयभावगतग्रहाणां फलान्युक्तानि । श्लोकाः स्पष्टार्थाः ॥ सूर्य द्वितीय भावमें हो तो जातक दानी धातु द्रव्यवाला, इष्ट शत्रुवाला और वाचाल हो। चन्द्रमा द्वितीय स्थानमें होतो कामी, तेज स्वरूप, सुन्दरवचन, बुद्धिमान्, विद्याशील और धनवान् हो ॥ ६२ ॥ मंगल द्वितीय स्थानमें हो तो धातुवाद-खेती-और घूमनेमें तत्पर तथा क्रोधी हो। बुध दूसरे भावमें हो तो बुद्धिसे उपार्जन किये धन-शील-गुण हों और साधु हो। गुरु द्वितीय भवनमें प्राप्त हो तो वाचाल, भोजन-सौख्यवाला, विशेष धनी और दानी हो। शुक्र द्वितीय स्थानमें हो तो विद्या-काम-कलाका ज्ञाता तथा धनवान् चालक हो ॥ ६३ ॥ शनि द्वितीय स्थानमें हो तो असत्य-वादी, चञ्चल, घूमनेवाला, दरिद्र, और ठग हो। धन भावमें राहु हो तो विरोधी हो। केतु द्वितीय भावमें हो तो लोगों का अपराधी हो ॥६४॥ अथ तृतीयस्थग्रहफलम् । शूरो दुर्जनसेवितोऽतिधनवान् त्यागी तृतीये रवौ । चन्द्रे सोदरराशिगेऽल्पधनिको बन्धुप्रियः सात्त्विकः । ख्यातोऽपारपराक्रमः शठमतिर्दुश्चिक्ययाते कुजे मायाकर्मपरोऽटनोऽतिचपलो दीनोऽनुजस्थे बुधे ॥ ६५ ॥ भ्रातृस्थानगते गुरौ गतधनः स्त्रीनिर्जितः पापकृत् शुक्रे सोदरगे सरोषवचनः पापी वधूर्निर्जितः । अल्पाशी धनशीलवंशगुणवान् भ्रातृस्थिते भानुजे राहौ विक्रमगेऽतिवीर्यधनिकः केतौ गुणी वित्तवान् ॥ ६६ ॥