जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७६ सटीकजातकपारिजाते- सोदरारातिगः शुक्रः शोकरोगभयप्रदः । तत्रैव शुभकारी स्यात् पुरतो यदि भास्करात् ॥ ६७ ॥ श्लोकत्रयेण तृतीयभावस्थग्रहाणां फलान्युक्तानि । सरलार्थाः श्लोकाः ॥ ६५-६७ ॥ सूर्य तीसरे भावमें हो तो पराक्रमी, दुर्जन सेवित, विशेष धनी, और दानी हो । चन्द्रमा तृतीय भावमें हो तो अल्प धनी, बन्धुप्रिय, और सात्विक हो । मंगल तीसरे भावमें हो तो अपार पराक्रमी, और शठ-बुद्धि हो । बुध तृतीय स्थानमें हो तो मायावी, घूमनेवाला, अत्यन्त चञ्चल और दीन हो ॥ ६५ ॥ गुरु भ्रातृ स्थानमें हो तो धन रहित, स्त्रीसे पराजित, पाप करनेवाला हो । शुक्र तृतीय भवनमें हो तो रोष युक्त वचन बोले, और पापी हो, तथा स्त्रीसे पराजित हो । शनि तृतीय स्थानमें हो तो अल्प भोजी, धन-शील-वंशसे युक्त और गुणवान् हो । राहु तीसरे भावमें हो तो अत्यन्त बली और धनी हो । केतु हो तो गुणी और धनी हो ॥ ६६ ॥ शुक्र तृतीय और षष्ठभावमें हो तो शोक-रोग-भय देता है, और उन्हीं स्थानों में शुक्र यदि सूर्यके आगे हो तो शुभ फल देता है ॥ ६७ ॥ अथ चतुर्थस्थग्रहफलम् । हृद्रोगी धनधान्यबुद्धिरहितः क्रूरः सुखस्थे रवौ विद्याशीलसुखान्वितः परवधूलोलश्चतुर्थे विधौ । भौमे बन्धुगते तु बन्धुरहितः स्त्रीनिर्जितः शौर्यवान् बन्धुस्थे शशिजे विबन्धुरमलज्ञानी धनी पण्डितः ॥ ६८ ॥ वाग्मी धनी सुखयशोबलरूपशाली जातः शठप्रकृतिरिन्द्रगुरौ सुखस्थे । स्त्रीनिर्जितः सुखयशोधनबुद्धिविद्यावाचालको भृगुसुते यदि बन्धुयाते ॥ ६६ ॥ आचारहीनः कपटी च मातृक्लेशान्वितो भानुसुते सुखस्थे । राहौ कलत्रादिजनावरोधी केतौ सुखस्थे च परापवादी ॥ ७० ॥ त्रिभिः श्लोकैश्चतुर्थभावगतानां ग्रहाणां फलान्युक्तानि । स्पष्टार्थाः श्लोकाः॥६८-७०॥ सूर्य चतुर्थ स्थानमें हो तो हृदय रोगवाला, धन-धान्य-बुद्धिरहित और क्रूर होवे । चन्द्रमा चतुर्थ स्थानमें हो तो विद्या-शील-सुखसे युक्त और परस्त्रीगामी हो । मंगल चतुर्थ स्थानमें हो तो परिवारसे हीन, स्त्रीसे निर्जित और पराक्रमी हो । बुध चतुर्थ स्थानमें हो तो परिवार रहित, श्रेष्ठ ज्ञानी, धनी, और पंडित हो ॥ ६८ ॥ बृहस्पति सुख स्थानमें हो तो वाचाल, धनी, सुख-यश-रूप-बलवाला, शठ-स्वभाव होता है । यदि शुक्र चतुर्थ स्थानमें हो तो स्त्रीसे पराजित, सुख-यश-धन-विद्या युक्त हो और वाचाल हो ॥ ६९ ॥ शनि सुख भवन में हो तो आचार हीन, कपटी, मातृ-क्लेश युक्त हो । राहु चतुर्थमें हो तो स्त्री आदि जनोंका अवरोध करनेवाला हो । केतु सुखमें हो तो दूसरों को दोष लगानेवाला हो ॥ ७० ॥ अथ पञ्चमस्थग्रहफलम् । राजप्रियश्चञ्चलबुद्धियुक्तः प्रवासशीलः सुतगे दिनेशे । मन्त्रक्रियासक्तमना दयालुर्घनी मनस्वी तनये सतीन्दौ ॥ ७१ ॥ क्रूरोऽटनश्चपलसाहसिको विधर्मा भोगी धनी च यदि पञ्चमगे धराजे । मन्त्राभिचारकुशलः सुतदारवित्तविद्यायशोबलयुतः सुतगे सति ज्ञे ॥ ७२ ॥ मन्त्री गुणी विभव(सार समन्वितः स्यादल्पात्मजः सुरगुरौ सुतराशियाते । सत्पुत्रमित्रधनवानतिरूपशाली सेनानुरङ्गपतिरात्मजगे च शुक्रे ॥ ७३ ॥