जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वन्द्यादिग्रहयोगाध्यायः ॥ ८ ॥ २७७ मत्तश्चिरायुरसुखी चपलश्च धर्मी जातो जितारिनिचयः सुतगेऽर्कपुत्रे । भीरुर्दयालुरधनः सुतगे फणीशे केतौ शठः सलिलभीरुरतीव रोगी ॥ ७४ ॥ अत्र चतुर्भिः श्लोकैः पञ्चमभावगतग्रहफलान्युक्तानि । श्लोकाः सरलार्थाः ॥ ७१-७४॥ सूर्य पञ्चम स्थानमें हो तो राजाका प्रिय, चञ्चल बुद्धिवाला, और परदेशमें रहनेवाला होता है। चन्द्रमा पञ्चम स्थानमें हो तो मन्त्र-क्रियामें आसक्त चित्त, दयावान्, धनी, और मनस्वी होवे ॥ ७१ ॥ मंगल पञ्चम स्थानमें हो तो क्रूर, घूमनेवाला, चपल, साहसी, विधर्मी, भोगी और धनी होता है। बुध पञ्चम स्थानमें हो तो मन्त्र तथा अभिचारमें कुशल, पुत्र-स्त्री-धन- विद्या-यश-बलसे युक्त होवे ॥ ७२ ॥ बृहस्पति पञ्चम स्थानमें हो तो मन्त्री, गुणी, विभवसारसे युक्त और अल्प सन्तान- वाला हो। शुक्र पञ्चम भावमें हो तो सुपुत्रवान्, धनी, अत्यन्त रूपवान्, सेना और घोड़ों- का पति होवे ॥ ७३ ॥ शनि पञ्चम भावमें हो तो मत्त, चिरायु, सुखरहित, चपल और धर्मात्मा हो। राहु पञ्चममें हो तो डरपोक, दयालु और दरिद्र हो। ५ वें केतु हो तो शठ, जलभीरु और विशेष रोगी हो ॥ ७४ ॥ अथ षष्ठस्थग्रहफलम् । कामी शूरो राजपूज्योऽभिमानी ख्यातः श्रीमान् शत्रूँयाते दिनेशे । अल्पायुः स्यात् क्षीणचन्द्रेऽरिसंस्थे पूर्णे जातोऽतीव भोगी चिरायुः ॥ ७५ ॥ स्वामी रिपुघ्नयकरः प्रबलोदराग्निः श्रीमान् यशोबलयुतोऽवनिजे रिपुँस्थे । विद्याविनोदकलहप्रियकृद्विशालो बन्धूपकाररहितः शशिजेऽरियाते ॥ ७६ ॥ कामी जितारिरबलोऽरिगतेऽमरेज्ये शोकापवादसहितो भृगुजे रिपुस्थे । बह्वाशनो विषमशीलसपत्नभीतः कामी धनी रविसुते सति शत्रूयाते ॥ ७७ ॥ राहौ रिपुस्थानगते जितारिश्चिरायुरत्यन्तसुखी कुलीनः । बन्धुप्रियोदारगुणप्रसिद्धविद्यायशास्त्री रिपुगे च केतौ ॥ ७८ ॥ श्लोकैश्चतुर्भिः षष्ठभावे ग्रहाणां फलानि कथितानि । श्लोकाः स्पष्टार्थाः ॥ ७५-७८ ॥ सूर्य षष्ठ स्थानमें हो तो कामी, शूर, राजपूल्य, अभिमानी, ख्यात और श्रीमान् हो। क्षीण चन्द्रमा शत्रुस्थान (षष्ठ) में हो तो अल्पायु हो, पूर्ण चन्द्रमा हो तो अति भोगी और दीर्घायु हो ॥ ७५ ॥ मङ्गल षष्ठ स्थानमें हो तो जनस्वामी, शत्रुनाशक, प्रबल जठराग्नि, श्रीमान्, यश-बल युक्त हो। बुध षष्ठ स्थानमें हो तो विद्याविनोदी, कलहप्रिय, शीलरहित, परिवारके उपकार- से हीन होवे ॥ ७६ ॥ बृहस्पति षष्ठ स्थानमें हो तो कामी, शत्रुओंको जीतनेवाला और अबल हो। शुक्र षष्ठ स्थानमें हो तो शोक-अपवादसे युक्त हो। शनि षष्ठ स्थानमें हो, तो विशेष भोजन करने वाला, विषमबुद्धि, शत्रुसे भयभीत, कामी और धनवान् हो ॥ ७७ ॥ राहु शत्रु स्थानमें हो तो शत्रुसंहारक, दीर्घायु, विशेष सुखी और कुलीन हो। केतु षष्ठ स्थानमें हो तो बन्धुप्रिय, उदार, गुणप्रसिद्ध, विद्वान् और यशस्वी हो ॥ ७८ ॥ अथ सप्तमस्थग्रहफलम् । स्त्रीद्वेषी मदनस्थिते दिनकरेऽतीव प्रकोपी खल- श्चन्द्रे कामँगते दयालुरटनः स्त्रीवश्यको भोगवान् । स्त्रीमूलप्रविलापको रणरुचिः कामँस्थिते भूमिजे व्यङ्गः शिल्पकलाविनोदचतुरस्तारासुतेऽस्तँ गते ॥ ७६ ॥ २४ जा०