भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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अष्टकवर्गाध्यायः ॥१०॥ ३२१ मेषादि राशिके जिस गृहमें ८ बिन्दु हों वह भाव पुष्टि-बल-वृद्धि करनेवाला होता है। जो भाव ६ बिन्दु ५ बिन्दु ७ बिन्दुसे युक्त हों वे भी शुभ फल देनेवाले होते हैं। जो भाग ३ बिन्दु २ बिन्दु से युक्त हों वे शुभ नहीं हैं ॥ ३ ॥ जो भाव चार बिन्दुसे युक्त हों वे मिश्र फल देते हैं। जो भाव बिन्दुसे रहित हो वह रोग-अपवाद-भयको देता है। एक आदि बिन्दुसे युक्त सूर्यादि ग्रहोंके भिन्नाष्टक वर्गसे उत्पन्न सम्पूर्ण फलको कहता हूँ ॥ ४ ॥ एक बिन्दु नाना प्रकारका रोग-दुःख-भय और भ्रमण कराता है। दो बिंदु मनमें ताप, राजा और चोरसे दुःख, अपवाद, तथा भोजनमें कष्ट देते हैं। तीन बिन्दु अच्छे प्रकारसे चलनेमें रोक, कृश शरीर तथा मनको व्याकुल करते हैं। चार बिन्दु सुख-दुःख, धन आदि- का आय-व्यय-प्रद हैं याने अच्छा बुरा दोनों ही समान होते हैं ॥ ५-६ ॥ पांच बिन्दु उत्तम वस्त्रका लाभ, पुत्रका लालन, साधु सङ्ग और विद्या धनको देते हैं। छः बिन्दु नवीन तथा मोहित करने वाला रूप, शील, युद्धमें विजय, धन-यश-बल-वा- हन देते हैं ॥ ७ ॥ सात बिन्दु घोड़ा आदिकी सवारी, सेना, धन, विभव, शोभा आदिको देते हैं। आठ बिन्दु सद्गुण में श्रेष्ठ राज प्रतापको प्रकाश करते हैं (देते हैं) ॥ ८ ॥ शरादिबिन्दुस्थितराशियातः स्वकीयवर्गे शुभदस्तु नित्यम्। अतोऽन्यथा चेदफलप्रदाता गोचारतः शून्यफले प्रमादी ॥ ९ ॥ स्वोच्चमित्रादिवर्गस्थाः केन्द्रादिबलसंयुताः । अनिष्टफलदाः सर्वे स्वल्पबिन्दुयुता यदि ॥ १० ॥ दुष्टस्थानस्थिता ये च ये च नीचारिभांशगाः । ते सर्वे शुभदा नित्यमधिबिन्दुयुता यदि ॥ ११ ॥ दिनेशमुख्यग्रहवर्गकेषु यदा शनिः शून्यगृहं प्रयातः । करोति पित्रादिकभावजानामतीव रोगारिभयाकुलानि ॥ १२ ॥ इदानीमष्टकवर्गे स्थितिवशेन बिन्दुपरत्वेन च फलान्युच्यन्ते । स्वकीयवर्गे विद्यमानो ग्रहः, शरादिबिन्दुस्थितराशियातः = शरादयः (पञ्च, षट्, सप्त, अष्टौ वा) बिन्दवो यत्र यत्र विद्यन्ते तत्र राशौ व्यवस्थितः स्यात्तदाऽसौ ग्रहस्तत्तद्भावे नित्यं = यदा यदा चारवशाद्गच्छेत्तदा सदैव शुभदो भवेत् । अतोऽन्यथा चेत् = यदि पञ्चाल्पबिन्दुयुतराशिषु स्ववर्गहीनो ग्रहो व्यवस्थितः स्यात्तदा अफलप्रदाता = निष्फलः स्यादिति । शून्यफले = बिन्दुरहिते राशौ गोचारतः समागते ग्रहे प्रमादी = श्रमशीलो भवति नर इति । अधिकारयुक्ता अपि ग्रहा यद्यल्पबिन्दुकाः स्युस्तदा विफला एव स्युरित्याह-स्वोच्चेत्या- दि । ये ग्रहा स्वकीयोच्च-मित्रादि--वर्गस्था भवेयुः, केन्द्रादिभिर्बलैः संयुक्ता अपि भवेयुस्ते यदि अष्टकवर्गे स्वल्पबिन्दुयुताः = अर्द्धाल्पबिन्दुकाः स्युस्तदा तथाभूताः सर्व एव ग्रहा अनिष्टफलदा भवन्ति । अथ ये च ग्रहा दुष्टस्थानस्थिताः = षडादिगर्हितभावगताः, ये च नीचारिभांशगताश्च भवेयुस्ते यदि, अधिबिन्दुयुताः = अर्द्धाधिकबिन्दुसहिता भवेयुस्तदा ते सर्वे नित्यं शुभदा एव भवन्ति । नाधिकबिन्दुकाः कदाचिद्दोषावहा भवन्तीति भावः । अथ शनेः वैशिष्टयमुच्यते । दिनेशमुख्यग्रहवर्गकेषु = सूर्यादिपञ्चग्रहाणां वर्गगतः शनिः यदा अष्टकवर्गे शून्यगृहं = बिन्दुरहितं भावं चारवशात्प्रयाति तदा पित्रादिकभावजानां = पितृमातृप्रभृतीनां अतीव रोगारिभयाकुलानि करोति ॥ ९-१२ ॥ पांच आदि बिन्दु जिस राशिमें स्थित हों उस राशिमें अपने वर्गमें जो ग्रह हो वह सदा शुभप्रद है। इससे अन्यथा हो तो गोचरसे दुष्ट फल देता है। शून्य बिन्दुवाला ग्रह प्रमाद फल देनेवाला है ॥ ९ ॥