जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमद्वितीयभावफलाध्यायः ॥१९॥ ३५७ धनेश लाभ स्थानमें हो और लाभेश धन स्थान में या लाभमें हो या दोनों केन्द्रमें हों तो धनवान् और विख्यात होवे ॥ ५९ ॥ धनेश द्वादश या षष्ठ स्थानमें हो, व्ययेश धनमें हो, अथवा लाभेश षष्ठ वा अष्टम स्थानमें हो, व्ययमें हो तो तीनों स्थितिमें जातकके धनका नाश कहे ॥ ६० ॥ गुरु व्यय भावमें हो, धनेश निर्बल हो और शुभग्रह लग्नको न देखता हो तो जातकके धनका नाश कहे ॥ ६१ ॥ लग्नेश धन भावमें हो, धनेश लाभ स्थानमें हो, वा लाभेश लग्नमें हो तो निधि आदि धन उस जातकको प्राप्त हो ॥ ६२ ॥ लग्न-एकादश-द्वितीय-नवमके स्वामी परम उच्चांशमें प्राप्त हों वा अपने २ वैशेषि- कांशमें प्राप्त हों तो-करोड़ पति होवे ॥ ६३ ॥ धनेश नीचराशिमें अस्त होवे और पाप षष्ट्यंश में हो तो मनुष्य ऋणसे ग्रस्त होवे ॥६४॥ अथ नेत्रविचारः । शुक्रेन्दुनयनाधीशैरैकस्थ