जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 406, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ें१८० सटीकजातपारिजाते- इदानीं पितुर्विटत्वमाह—षष्ठेश्वरेणेति। सुखराशिनाथः = चतुर्थेश्वरः षष्ठेश्वरेण सहितो यदि धर्म-(नवम) स्थितो भवेत्तदात्रास्मिन् योगे जातस्य जनकं = पितरं विटं धूर्तं कामुकं करोति। यदि मातृनाथः = चतुर्थेशः भाग्याधिपेन नवमेशेन सहितः सन् सौख्यस्थितः = चतुर्थे एवं गतः स्यात्तदात्र जनक विट करोति। अत्र योगे जातो विटेनोत्पादितोऽपि वा जातस्य पिता विटो ज्ञेय इति ॥ ६७ ॥ षण्मातृपौ = षष्ठेश-चतुर्थेशौ, पितृस्थाने = लग्नान्नवमे भावे भवेतां तदा पितुः व्य- भिचारदौ भवतः। अस्मिन् योगे जातस्य पिता व्यभिचारी (परदारसक्तः) भवति। मातृ- तातारिदेहेशैः = चतुर्थेश-नवमेश-षष्ठेश-लग्नेशैश्चतुर्भिग्रहैरेकस्थः यत्र तत्रैकभावगतैर्जा- तः, परजातकः = अन्यपुरुषोत्पादितः भवति ॥ ६८ ॥ सुखेश षष्ठेशके साथ धर्म भावमें स्थित हो तो जातकका पिता धूर्त होवे। यदि सुखेश नवमेशके साथ सौख्य स्थानमें हो तो पिता विट (धूर्त) हो ॥ ६७ ॥ षष्ठेश और सुखेश ९ वें में हों तो जातकके पिताको व्यभिचारी बनावें। सुखेश, नव- मेश, षष्ठेश और लग्नेश एक भवनमें हों तो दूसरेसे जायमान जातकको जाने ॥ ६८ ॥
[कुंडली १]
| भाव | राशि / ग्रह / विवरण |
|---|---|
| १ | १ |
| २ | २ |
| ३ | ३ |
| ४ | ४, विटो जनकः १ |
| ५ | ५ |
| ६ | ६ |
| ७ | ७ |
| ८ | ८ |
| ९ | सु. षु. ९ |
| १० | १० |
| ११ | ११ |
| १२ | १२ |
[कुंडली २]
| भाव | राशि / ग्रह / विवरण |
|---|---|
| १ | १ |
| २ | २ |
| ३ | ३ |
| ४ | ४ चं. गु., विटो जनकः २ |
| ५ | ५ |
| ६ | ६ |
| ७ | ७ |
| ८ | ८ |
| ९ | ९ |
| १० | १० |
| ११ | ११ |
| १२ | १२ |
[कुंडली ३]
| भाव | राशि / ग्रह / विवरण |
|---|---|
| १ | २, व्यभिचारी-पिता |
| २ | ३ |
| ३ | ४ |
| ४ | ५ |
| ५ | ६ |
| ६ | ७ |
| ७ | ८ |
| ८ | ९ |
| ९ | १० सू. शु. |
| १० | ११ |
| ११ | १२ |
| १२ | १ |
[कुंडली ४]
| भाव | राशि / ग्रह / विवरण |
|---|---|
| १ | १, परजातः |
| २ | २ |
| ३ | ३ |
| ४ | ४ चं. गु. बु. मं. |
| ५ | ५ |
| ६ | ६ |
| ७ | ७ |
| ८ | ८ |
| ९ | ९ |
| १० | १० |
| ११ | ११ |
| १२ | १२ |
एतानि कल्पितोदाहरणानि बालावबोधार्थं प्रदर्शितानीति । पापेक्षिते पापयुते शशाङ्के दिवाकरे वा यदि केन्द्रराशौ। क्रूरे सुखे वा यदि पापद्ष्टे जातो नरः स्याद्यदि मातृगामी ॥ ६९ ॥ चन्द्रे भृगौ वा केन्द्रस्थे पापद्दष्टेऽथवा द्वयोः। क्रूरे सुखे मातृगामी यदि वा गुरुदारभाक् ॥ ७० ॥ इदानीं जातस्य मातृगामित्वमाह—पापेक्षित इति। चन्द्रे वा सूर्ये पापग्रहेण दृष्टे युते वा यदि केन्द्रराशौ गते, यदि वा क्रूरे = पापग्रहे सुखे तस्मिन् पापद्ष्टे च जातो नरः मातृ- गामी = मात्रा सह पापकृद्भवेत्। चन्द्रे वा भृगौ = शुक्रे, केन्द्रस्थे तस्मिन् पापेन दृष्टे च, अथवा द्वयोः = चन्द्रशुक्रयोः