जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ सटीकजातकपारिजाते- रक्ताम्बराभरणदः सुरपूजितेर्क्षे चन्द्रे सुरेन्द्रसचिवेक्षितसंयुते वा ॥ १०१ ॥ आन्दोलिकातुरगलाभमुपैति जातः शुक्रेन्दुयानपतयस्तनुनाथयुक्ताः । एकत्र देवगुरुयानपचन्द्रशुक्राः केन्द्रत्रिकोणगृहगाश्चतुरङ्गयानम् ॥ १०२ ॥ वाहनेशे गुरुयुते चतुरङ्गाख्यवाहनम् । यानेशे सशुभे माने चामरच्छत्रसंयुतः ॥ १०३ ॥ सुखेश्वरे केन्द्रगते तदीशे लग्नस्थिते वाहनयोगवन्तः । कर्मेश्वरे लाभगते तदीशे कर्मस्थिते भूषणयानवन्तः ॥ १०४ ॥ अधुना वाहनविचारमाह-वाहनेश इत्यादि-नवभिः श्लोकैः । तत्र श्लोकार्थ सरलार्थी इति न व्याख्याताः ॥ ९६-१०४ ॥ चतुर्थेश और चतुर्थ भाव बली हों शुभग्रहसे दृष्ट हों तो वाहन आदिका सुख हो ॥९६॥ सुखेश सुखमें बुधके साथ हो शुभग्रह उसे देखते हों शुभग्रहके राशि वा अंशमें हो तो वाहनादिकी प्राप्ति कहे ॥ ९७ ॥ चन्द्रमा लग्नका संबन्धी हो, सुखेशसे युक्त हो तो उस जातकको घोड़ाका वाहन हो ऐसा श्रेष्ठ मुनि लोग कहते हैं ॥ ९८ ॥ द्वितीय वा चतुर्थ भावगत शुभराशिमें चन्द्रमा हो शुभग्रहसे युक्त हो तो उस जातकको घोड़ा वाहन मिले ॥ ९९ ॥ चतुर्थेश चन्द्रमाके साथ लग्नमें हो लग्नेश्वरसे भी युक्त हो तो उसे घोड़ेका लाभ हो । यदि चतुर्थेश शुक्रसे युक्त लग्नमें हो तो उसे नरवाहन प्राप्त हो ॥ १०० ॥ बलवान् शुक्र तथा पूर्ण चन्द्रमा केन्द्र या त्रिकोणमें प्राप्त हों तो आन्दोलिका और आभरणको देवें । वे दोनों यदि बृहस्पतिके गृहमें हों तो रक्तांबरा और भूषणको देवें । चन्द्रमा यदि बृहस्पतिसे दृष्ट युत हो तो भी यही फल जाने ॥ १०१ ॥ शुक्र, चन्द्रमा और चतुर्थेश लग्नेशके साथ हो तो आन्दोलिका (पालकी) और तुरङ्ग (घोड़ा) का लाभ हो । बृहस्पति, सुखेश, चन्द्रमा और शुक्र एकत्र होकर केन्द्र या त्रिकोण गृहमें हों तो चतुरंग यान (सवारी) होवे ॥ १०२ ॥ चतुर्थेश बृहस्पतिसे युक्त हो तो चतुरंग वाहन प्राप्त हो । चतुर्थेश शुभग्रहके सहित १० वें हो तो जातक चामर छत्रसे युक्त हो (राजा हो) ॥ १०३ ॥ चतुर्थेश केन्द्रमें हो और उस केन्द्रका स्वामी लग्नमें हो तो वह वाहनवाला होता है । दशमेश एकादशमें हो और लाभेश १० वें में हो तो भूषण तथा सवारीवाला होवे ॥१०४॥ अथ राज्यविचारः । यानेशे लाभराशिस्थे सुखे वा लाभगे कुजे । अथवा भौमराशिस्थे राज्यप्राप्तिर्न संशयः ॥ १०५ ॥ राज्यप्राप्तियोगमाह- यानेश इति । यानेशे = चतुर्थेशे लाभराशिस्थे, कुजे सुखे = चतुर्थे वा लाभगे, अथवा भौमराशिस्थे मेषवृश्चिकान्यतरराशिगते जातस्य राज्यप्राप्तिर्भव- तीत्यत्र संशयो न । Notes- 'अथवा भौमराशिस्थे' इत्यस्यार्थः-भौमे भौमराशिस्थे, किंवा यानेशे भौमराशिस्थे इत्यपि भवितुं युज्यते । तथा च सर्वार्थचिन्तामणौ- "क्षेत्रेश्वरे लाभगते बलाढ्ये बन्धौ भवे वा क्षितिसूनुयुक्ते । भूसूनुराशौ यदि वा सुखेशे राज्यार्थसौख्याभरणादियानम् ॥ इति ॥ १०५ ॥ चतुर्थेश ११ वें वा ४ थे में हो मंगल लाभमें हो वा उन स्थानोंमें मंगलकी (१।८) राशि हो तो राज्य प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं है ॥ १०५ ॥ लग्नाद्वाहनराशिगस्तदधिपस्तद्वीक्षकश्च त्रयः स्वोच्चस्वर्क्षसुहृद्गृहेषु बलिनः केन्द्रत्रिकोणायगाः ।