भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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(२ X ४) = ८ । कृत्तिकानक्षत्रस्य वर्त्तमानेन पदेना=( ४ ) नेन सहित जातं=(८ + ४) १२ । अतएव मीनांशदशायां तस्य जन्म जातमस्तत्पूर्णायुर्मानं = ८६ षडशीतिः । अथ कृत्ति- काचतुर्थचरणभुक्तमान—( ७।८ ) मेतत् मीनांशपूर्णायुर्मानेनानेन ( ८६ ) संगुणितं जातं= ( ७।८ ) X ८६ = ४२८प X ८६ = ३६८०८प । एतत् नवशतेन ( ९००) भक्तम् । जातं भुक्तदशामानं वर्षादि=४०।१०।२३।१२ । एतत् पूर्णायुर्माना—(८६) दस्माच्छोधितं जातं= ८६—( ४०।१०।२३।१२ ) भोग्यदशामानम् = ४५।१।३६।४८; स्पष्टार्थं चक्रं विलोक्यम् ॥ पांच रेखायें पूर्वसे पश्चिम तक ( खड़ी ) लिखे और पांच रेखायें बेड़ी लिखे इस तरह १६ कोष्ठ होते हैं; उनमें बीचके ४ कोष्ठों को त्याग दे, तो १२ कोष्ठका चक्र होता है उसमें पूर्वखे ईशान पर्यन्त मेषादि द्वादश राशि के स्वामी प्रत्येक कोष्ठ के स्वामी जानने चाहिये ॥४॥ मेषादि राशिके और मेषादि नवांशके क्रमसे मंगल, शुक्र, बुध, चन्द्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, शनि और गुरु पति हैं ऐसा मनीषा गण कहते हैं ॥ ५ ॥ सूर्यादि ग्रहके ५।२१।७।९।१०।१६।४ क्रमसे दशा वर्ष हैं। जो ग्रह जिस राशिका स्वामी है उस ग्रहका वर्ष ही उस राशिका भी वर्ष जाने जैसे-( सिंह ५, कर्क २१, मे-वृ ७, मि-कं ९, ध-मी. १०, वृ-तु १६, म-कु ४) ॥ ६ ॥ अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल और पूर्वाभाद्रपदादि तीन २ नक्षत्रोंके पादोंमें सव्यक्रमसे मेषसे अंशोंको गिने । रोहिणी, मघा विशाखा और श्रवण आदि नक्षत्रमें वृश्चिक आदि राशिसे अंशकोंको क्रमसे गिने । सव्यके प्रत्येकसे तीन नक्षत्रके चार २ चरणोंसे १२ राशि- योंमें मेषसे प्रदक्षिणा करके मीन पर्यंत लिखे । अपसव्यके प्रत्येक नक्षत्रसे तीन नक्षत्रके चार २ चरणोंसे वृश्चिकसे उलटा क्रमसे धनु पर्यन्त लिखे । सव्य और अपसव्य मार्गसे अश्विनी आदिसे तीन २ नक्षत्र जिसमें सव्य क्रमसे देहादि और वाममें जीवादि जाने । इसका स्पष्टीकरण संस्कृत चक्रसे कीजिये ॥ ७-११ ॥ मेष-वृष-मिथुन-कर्क-राशियोंके अंशमें क्रमसे ज्ञानक ( १०० वर्ष) मद (८५ व.) गज (८३ व ) तष्टा (८६) वर्ष परमायु कहे हैं। और ये ही उनके कोण (१।९) गृहमें पूर्णायु हैं ॥ इस प्रकार आयुका परिज्ञान करके देह और जीवकी कल्पना करके फलका विचार करे। पहला अंश 'देह' संज्ञक है। सबके अन्त्यमें 'जीव' है। अपसव्यमें विलोम (पहला जीव और अन्त्यमें 'देह' ) जाने ॥ १३ ॥ देहजीवे यदा राहुः केतुर्भौमो रविः स्थितः ॥ १४ ॥ तदा तस्मिन्भवेन्मृत्युर्देहे रोगः प्रवर्तते । देहजीवगृहं यातः सौम्यो जीवश्च भार्गवः ॥ १५ ॥ सुखसम्पत्करं सर्वं शोकरोगविनाशनम् ॥ मिश्रखेचरसंयुक्ते मिश्रं फलमवाप्नुयात् ॥ १६ ॥ इदानीं पूर्वपरिभाषितदेहजीवयोः फलमाह—देहजीव इत्यादिभिः । पूर्वपरिभाषिते देहे जीवे च सम्प्राप्ते निर्दिष्टग्रहे निर्दिष्टं फलं वाच्यम् । तथा च बृहत्पाराशरे— देहजीवसमायोगे भौमार्कैरविजादिभिः । एकैकयोगे मरणं बहुयोगे तु का कथा ॥ यत्र स्थाने तु सञ्जीवो देहयोगसमन्वितः । तत्र पापग्रहैर्योगे तद्दशामरणं भवेत् ॥ देहयोगे महाबाधा जीवयोगे तु मृत्युदः । द्वाभ्यां संयोगमात्रेण हन्यते नात्र संशयः ॥ जीवे जीवो यदा राहुः सौरिर्वक्रो रविः स्थितः । मृत्युकालगतिं ज्ञात्वा शान्तिं कुर्याद्यथाविधि ॥ जीवे जीवो यदा सोमः सौम्यो वाऽपि सितः स्थितः । तदा सौख्यं प्रकुर्वन्ति रोगमृत्युविनाशनम् ॥ पापक्षेत्रदशायोगे देहजीवौ तु दुःखदौ । शुभक्षेत्रदशायोगे शुभयोगे शुभं भवेत् । देहे शुभग्रहैर्युक्ते भूषणादि ध्रुवं भवेत् । जीवे शुभग्रहैर्युक्ते पुत्रदारादिकाँल्लभेत ॥ इति १४-१६ यदि सव्य या अपसव्य चक्रमें देह-जीवमें राहु, केतु, मंगल और सूर्य स्थित हो तो ४३ जा०

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