जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१० सटीकजातकपारिजाते- चन्द्रमा देह या जीवमें बन्धुवोंसे समागम, कन्याकी प्राप्ति, आरोग्यता, भूषण-सुख वस्त्र, राजपूज्य, वा दान क्रियादि, देव ब्राह्मणकी सेवा पुण्यतीर्थमें स्नान-पूजन और बहु अन्नसुखको करता है ॥ ३८ ॥ मंगल देह-जीवमें होनेसे शरीरमें ताप-रोग, अग्नि तथा चोरसे भय, कुटुम्बमें कलह भ्रातृनाश, क्षेत्र-धननाश, पदच्युति, युद्धनीति, गुल्म-बवासीर-कोढ-विष-शस्त्रसे भय और कुवृत्ति (निकृष्ट जीविका) को करता है। ज्वर, मसूरिका (शीतला) पित्त विकार, गँठिया बाव, विष-अग्नि-शस्त्र-शत्रु और राजासे भय मंगलका फल कहे ॥ ३९-४० ॥ बुध देह या जीवमें मित्रसे खूब प्रसन्नताकी प्राप्ति, विज्ञान-शील-निगमागम शास्त्रका बोध, स्त्री पुत्र-नृपभूषण-गौ-हाथी-घोड़ेका लाभ, विवेक-धन-यशकी वृद्धि करता है ॥ ४१ ॥ देह या जीवमें स्थित बृहस्पति-विविध प्रकारके धन-सुख, महत्त्व, राज्याभिषेक, राजा से पूजन आदि, स्त्री-पुत्रका लाभ, सुख-भूषण-ओजन-धन, आरोग्यता, कीर्ति, विजय, और परोपकारिता करता है ॥ ४२ ॥ शुक्र देह या जीवमें रतिका लाभ स्त्रियोंसे सुख, अनेक वस्त्र, धन-पशुवाहन-रत्नसमूह का लाभ, नाच-गानकी गोष्ठीमें विशेष प्रताप, सत्कीर्ति, दान, विभव और सुजनोंसे सत्संग कराता है ॥ ४३ ॥ देह जीवमें शनि कलह, शरीरको जीर्ण, मृत्यु, भ्रातृ दुःख, अग्नि-शत्रु-भूतका भय, विषसे पीड़ा, मान-अर्थकी हानि, गौरव-स्त्री-पुत्रका नाश और गृह-धन-कृषि-व्यापार- तथा गाय बैलोंका नाश करता है ॥ ४४ ॥ जीव या देहमें राहु हो तो शत्रुसे अपनेको पीड़ा, बन्धुको कष्ट, मनस्ताप, पक्षाघातादि पीड़ा और राजभय, मनुष्योंको कहे ॥ ४५ ॥ केतु देह या जीवमें हो तो अग्निसे पीड़ा, वृक्ष गिरना इत्यादि पीड़ा, दरिद्रता, बन्धु- नाश, स्थाननाश और धनक्षय होता है ॥ ४६ ॥ अथ चक्रदशाफलम् । लग्नचक्रदशाकाले देहारोग्यं महत्सुखम् । कीर्तिभूषणराज्यार्थसुतदाराम्बरायतिम् ॥ ४७ ॥ शुभक्षेत्रे शुभं सर्वं पापर्चे फलमन्यथा । तद्गतापासमयुक्ते शुभयुक्ते शुभादिकम् ॥ ४८ ॥ स्वक्षेत्रतुङ्गमित्रस्थखेचरेण समन्विते । विलग्नचक्रपाके तु राज्यार्थनृपपूजनम् ॥ ४९ ॥ नीचमूढारिराशिस्थखेचरेण समन्विते । पुत्रदारादिनाशं च मिश्रे मिश्रफलं वदेत् ॥ ५० ॥ इति लग्नफलम् । द्वितीयारांशिश्चक्रे तु धनधान्यविवर्द्धनम् । ओजनं सुतदारार्त्तिं क्षेत्रगोनृपपूजनम् ॥ ५१ ॥ विद्याप्तिं धाकपटुत्वं च सद्गोष्ठ्या कालयापनम् । शुभर्चे फलमेवं स्यात्पापर्चे फलमन्यथा ॥ ५२ ॥ इति द्वितीयफलम् । तृतीयाराशिवक्रस्य परिपाके महत्सुखम् । भक्ष्यभोज्यफलाप्तिं च शौर्यं धैर्यं मनोरथम् ॥ ५३ ॥