भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

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५१२ सटीकजातसपारिजाते- इति नवमफलम् । कर्मचक्रदशाकाले राज्याप्तिं नृपपूजनम् । सत्कीर्तिदारपुत्रात्मबन्धुसङ्गं महोत्सवम् ॥ ७० ॥ आज्ञाधरत्वमारोग्यं सद्गोष्ठ्या कालयापनम् । सत्कर्मफलमैश्वर्यं शुभराशौ वदेद् बुधः ॥ ७१ ॥ इति दशमफलम् । ११ लाभचक्रदशाकाले धनाप्त्यारोग्यभूषणम् । विचित्रवस्त्रागमनं गृहोपकरणं लभेत् ॥ ७२ ॥ स्त्रीपुत्रबन्धुसौख्याप्तिमृणद्रव्यायतिं शुभम् । राजप्रीति महत्सङ्गं प्रवदन्ति शुभोदये ॥ ७३ ॥ इति लाभफलम् । १२ व्ययचक्रदशाकाले देहार्तिं स्वपदच्युतिम् । चोराग्निनृपकोपादिवन्धुस्त्रीनृपपीडनम् ॥ ७४ ॥ उद्योगभङ्गमलस्यं कृषिगोभूमिनारानम् । दारिद्र्यं कर्मवैकल्यं पापर्क्षे तु न संशयः ॥ ७५ ॥ इति व्ययफलम् । इदानीं भावपरत्वेन कालचक्रदशाफलान्याह । अत्रेदमनवधेयम् । नक्षत्रपादवशात् सव्यापसव्यचक्रे यद्राश्यंशसम्बन्धिनी दशा समागच्छति स राशिर्जन्मकाले लग्नादिको यो भावस्तदुक्तं फलमत्र विनिर्दिशेत् । तत्र शुभराशिके शुभसंयुते व भावे कथितफलं शुभतर- मन्यथा (पापर्क्षे पापयुते च भावे) अशुभं च वाच्यमिति । श्लोकार्थाः सर्वे स्पष्टार्था एवे- त्युपेक्ष्यन्ते ॥ ४७-७५ ॥ अब १२ भावोंकी कालचक्र-दशाके फल कहते हैं—लग्नकी चक्रदशाकालमें देहकी आ- रोग्यता, महासुख, कीर्ति-भूषण-राज्य-अर्थ-पुत्र-स्त्री-वस्त्रकी प्राप्ति होती है ॥ ४७ ॥ यदि लग्न शुभ क्षेत्रमें हो तो शुभफल हो, पापक्षेत्रसे अन्यथा (अशुभ) फल होता है। उसी प्रकार पापग्रहयुक्त लग्नका भी फल है। शुभग्रहसे युक्त लग्नके होने पर शुभ फल होता है ॥ ४८ ॥ स्वगृह-उच्चस्थान-मित्रगृहमें प्राप्त ग्रहसे लग्न यदि युक्त हो तो लग्नकी चक्र दशामें राज्य-धनकी प्राप्ति और राजपूजन होता है ॥ ४९ ॥ नीच राशि-अस्तंगत-शत्रुराशिस्थ ग्रहसे लग्नके युक्त होने पर पुत्र-स्त्री आदिका नाश होता है । मिश्रमें मिश्र फल कहे ॥ ५० ॥ द्वितीय भावकी चक्र दशामें धन-धान्यकी वृद्धि होती है। भोजन, पुत्र, स्त्री-जमीन- की प्राप्ति तथा राजपूजन होता है। विद्याकी प्राप्ति, बोलनेमें पटुता, सज्जनोंके सङ्गसे कालका यापन होता है। दूसरे भावमें शुभ राशि होनेसे शुभफल एवं पापराशिसे पाप- फल होते हैं ॥ ५१-५२ ॥ तीसरे भावकी चक्रदशामें उत्तम सुख, सुन्दर भोजनादिका लाभ, साहस, धैर्य और स- न्तोषका लाभ, कर्णाभूषण, वस्त्र, कण्ठभूषण, सुन्दर अन्न और जलादिका लाभ होना कहे। ३ रा भाव शुभ होनेसे उक्त फल खूब उत्तम अन्यथा साधारण और अधम जानें ॥५३-५४॥ चौथे भावकी चक्रदशामें सवारी, भूषण, जमीन और तीर्थ आदिकी यात्राका लाभ हो, सज्जनोंसे सङ्ग हो, चित्तकी शुद्धि, उत्साह, स्त्री-पुत्रकी प्राप्ति, खेतीमें उन्नति, मित्रोंसे प्रेम, गृहोंका लाभ, महत् सुख, आरोग्य, धनलाभ, सुगन्ध और वस्त्रोंकी प्राप्ति होवे। यहां भी शुभ राशि होनेसे शुभफल तथा पापराशि होनेसे फलोंका नाश हो ॥ ५५-५७ ॥

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