जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालचक्रदशाध्यायः ॥१७॥ ५१३ पुत्रभावकी चक्रदशामें राज्यप्राप्ति, राजासे आदर, स्त्री-पुत्रकी प्राप्ति, धीरज, आरोग्य, बन्धुओंका पालन, अन्नदान, यशका लाभ, मङ्गलादिकी प्राप्ति, दूसरोंका उपकार, धनलाभ, सवारी और वस्त्राभरणोंकी प्राप्ति होवे। यहां भी शुभ और पापराशि तथा ग्रहोंके संयोगसे फलमें शुभाशुभ कहे ॥ ५८-६० ॥ छठे भावकी चक्रदशामें अग्निका भय, चोर-शत्रु-विष और राजाओंसे भय, पीडा, स्थानकी हानि, प्रमेह-गुल्म-पाण्डु-ग्रहणी और क्षय रोगसे भारी भय, स्त्रीके लिये अयश, पुत्र और बन्धुओंका नाश, जेल आदिमें बन्धन, विष आदि घातक वस्तुओंका खाना, कर्ज और गरीबीसे पीड़ा ये सब फल होते हैं। यदि छठा भाव शुभराशि हो तो उक्त फलोंमें कमी होती है। पापराशि होनेसे उक्त फल पूर्ण होते हैं ॥ ६१-६३ ॥ सातवें भावकी दशामें विवाह, स्त्रीसुख, पुत्रोदय, सुन्दर पक्वान्नादि भोजन, खेती- पशु-वाहन और भूषणकी प्राप्ति, राजासे आदर, सुन्दर यश होते हैं। यहां शुभराशि और शुभग्रहोंके योगसे फलमें विशेषता होती है ॥ ६४-६६ ॥ मृत्यु भावकी दशामें बहुत दुःख, धननाश, स्थाननाश, मित्रनाश, गुदारोग, उदररोग, दरिद्रता, अन्नसे अरुचि और अन्नका अभाव, शत्रुसे भय कहना चाहिये। यहां ८ वां भाव पापराशि और पापग्रह युक्त हो तो फल पूर्ण रूपसे होवे ॥ ६६-६७ ॥ नववें भावकी दशामें निश्चय शुभफल होते हैं। पुत्र, मित्र, स्त्री, धन, खेती, पशु और गृह एवं भूषणोंकी प्राप्ति, शुभकार्यकी सिद्धि, सज्जनोंसे प्रेम ये फल होते हैं। यहां शुभ- राशि और शुभग्रहोंके योगसे उक्तफलोंमें विशेषता भी होवे ॥ ६८-६९ ॥ दशवें भावकी दशामें राज्यप्राप्ति, राजासे आदर, सुयश-स्त्री-पुत्र-मित्रका उदय, मङ्ग- लोदय, हुकूमत, नीरोगता, सज्जनोंसे सङ्ग, सुन्दर कार्य कहने चाहिये। यहां शुभराशि होने से उक्तफल खूब सुन्दर होवे ॥ ७०-७१ ॥ लाभ भावकी दशामें धनलाभ, आरोग्य, भूषण, सुन्दर वस्तुओंका लाभ, स्वगृहके सामग्रियोंका लाभ, स्त्री-पुत्र-मित्र-बन्धुओंका उदय, लहनेका लाभ, राजासे प्रेम और सज्ज- नोंसे सङ्ग होते हैं ॥ ७२-७३ ॥ व्यय भावकी दशामें शरीरमें पीड़ा, पदका नाश, चोर-अग्नि-राजाओंके कोपसे भय, बन्धु-स्त्री और राजासे पीड़ा, उद्योगका नाश, आलस्य, खेती-पशु प्रभृतिकी क्षति, दरि- द्रता और कर्मोंमें विफलता होती है। यहां पापराशि और पापग्रहोंके योगसे फलमें विशे- षता कहनी चाहिये। उपर्युक्त फलोंमें यह विशेषता जाननी चाहिये कि शुभफलोंमें भाव यदि शुभराशि और शुभग्रह युक्त हो तो शुभमें विशेषता और पापफलोंमें पापराशि और पापयुक्त हो तो पापमें विशेषता इसका उलटा हो तो उलटा फल कहे ॥ ७४-७५ ॥ अथ चक्रदशाफलेषु विशेषः । लग्नादिद्वादशान्तानां भावानां फलमीदृशम् । प्रोक्तमत्र विशेषोऽस्ति विशेषात्कथ्यतेऽधुना ॥ ७६ ॥ तत्तद्राशीशवीर्येण यथायोग्यं प्रयोजयेत् । राशीश्वरे बलयुते स्वोच्चमित्रस्ववर्गके ॥ ७७ ॥ मित्रान्विते शुभैर्दृष्टे यत्प्रोक्तं तच्छुभं वदेत् । बलहीनेऽरिनिचस्थे दिनेशकरपीडिते ॥ ७८ ॥ षष्ठाष्टमव्ययस्थाने पापशत्रुनिरीक्षिते । तद्राशिपे तु जनने कष्टं राश्युद्भवं फलम् ॥ ७९ ॥ फलं तद्विगुणं कष्टं शुभं राश्युद्भवं फलम् । अधिपस्य बलं हीनं यदि चानर्थमाप्नुयात् ॥ ८० ॥