भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

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दशाफलाध्यायः ॥१८॥ ५४५ बृहस्पतिकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा हो तो शत्रुका नाश, जय, सौख्य, चित्तोत्साह, धनागम, राजप्रसाद और आरोग्यता होती है ॥ ११५ ॥ बृहस्पतिकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा हो तो स्त्री-कृत उत्साह, ऐश्वर्य, राजप्रीति, सुखकी प्राप्ति, दिव्य वस्त्र, विभूषणकी प्राप्ति होती है ॥ ११६ ॥ बृहस्पतिकी दशामें मङ्गलकी अन्तर्दशा हो तो कर्मका नाश, घूमना, ज्वरताप, महा- भय, धननाश और निरुत्साह होता है ॥ ११७ ॥ बृहस्पतिकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो सर्वक्लेश, भय, रोग, सर्व उपद्रवका कारण और धन नाश होता है ॥ ११८ ॥ उच्चराशिमें नीचराशिके नवांशगत गुरुकी दशा हो तो चोर-शत्रु-से भय, राजाका भय और अशुभ फल करता है। नीचराशिमें उच्चका नवांश यदि हो तो महाराजकी प्रसन्नता, सुख, विद्या, बुद्धि, धन-यश, विभव और देशाधिपत्य प्राप्त होता है ॥ ११९ ॥ अथ गुरुदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् । | बृ. बृ. | बृ. श. | बृ. बु. | बृ. के. | बृ. शु. | बृ. सू. | बृ. चं. | बृ. मं. | बृ. रा. | योगः | | २ | २ | २ | ० | २ | ० | १ | ० | २ | १६ | | १ | ६ | ३ | ११ | ८ | ६ | ४ | ११ | ४ | ० | | १८ | १२ | ६ | ६ | ० | १८ | ० | ६ | २४ | ० | अथ शनिदशाफलम् । शनेर्दशायामजगर्दभोष्ट्रवृद्धाङ्गनापक्षिकुधान्यलाभम् । श्रेणीपुरग्रामजनाधिकाराद्धनं वदेन्नीचकुलाधिपत्यम् ॥ १२० ॥ इदानीं शनिदशाफलमाह । तत्र शनेः स्थितिवशात् फलेऽपि न्यूनाधिक्यं ब्रूयात् ( श्लो. १३१ द्र. ) । श्लोकोऽयं सरलार्थ एवेति ॥ १२० ॥ शनिकी दशामें बकरा, गदहा, ऊंट, वृद्धस्त्री, पक्षी, कुधान्यका लाभ होता है। श्रेणी- पुर-ग्राम जनाधिकारसे धन और नीच कुलाधिपत्यका लाभ कहे ॥ १२० ॥ अथ शनैश्चरदशायामन्तर्दशाफलानि । श. श.—क्लेशादिभिर्व्याधिनिपीडनं च मात्सर्यमानैर्बहुशोकतापम् । भूपालचोरैर्धनधान्यनाशं करोति मन्दः स्वदशापहारे ॥ १२१ ॥ रवितनयदशायां स्वापहारे विरोधं नरपति जनकोपं प्रेष्यवृद्धाङ्गनाप्तिम् । पशुगणविषभीतिं पुत्रदारादिपीडां ज्वरपवनकफार्तिं शूलरोगं वदन्ति ॥ १२२ ॥ श. बु.—सुखवित्तयशोवृद्धिं सत्कर्माचारसम्पदः । कृषिवाणिज्यमाप्नोति बुधे मन्ददशान्तरे ॥ १२३ ॥ श. के.—वातपित्तकृतं रोगं कलहं नीचदुर्जनैः । दुःस्वप्नभयमाप्नोति केतौ मन्ददशान्तरे ॥ १२४ ॥ श. शु.—बन्धुस्नेहं जनप्रीतिं जायावित्तधनायतिम् । कृष्यादिसुखमाप्नोति भृगौ मन्ददशान्तरे ॥ १२५ ॥ श. सू.—पुत्रदारविनाशं च नृपचोरादिपीडनम् । मनोभयमवाप्नोति भानौ मन्ददशान्तरे ॥ १२६ ॥ श. चं.—गुरुस्त्रीमरणं दुःखं बन्धुद्वेषं धनागमम् । वातरोगमवाप्नोति चन्द्रे मन्ददशान्तरे ॥ १२७ ॥ श. मं.—स्थानच्युतिं महारोगं नानाविधमनोभयम् । सहोदरसुहृत्पीडां भौमे मन्ददशान्तरे ॥ १२८ ॥