भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

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५४८ सटीकजातकापारिजाते- बुधकी दशामें शुक्रकी अन्तर्दशा हो तो गुरु देवता अग्नि ब्राह्मणमें दान, धर्मप्रिय, तप, धन, वस्त्र, विभूषणकी प्राप्ति होती है ॥ १३५ ॥ बुधकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा हो तो वस्त्र, भूषण, धनकी प्राप्ति, राजप्रीति, महत् सुख और धर्मकथा प्राप्ति होती है ॥ १३६ ॥ बुधकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा हो तो रोग, शत्रुजनसे वैर, सर्व-काम-धनका नाश, चतुष्पदसे भय प्राप्त होता है ॥ १३७ ॥ बुधकी दशामें मंगलकी अन्तर्दशा हो तो रोग-शत्रु-भयका नाश, पुण्य, कर्मफल, यश, और राजप्रीति प्राप्त होती है ॥ १३८ ॥ बुधकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो मित्र-बन्धु-धनकी प्राप्ति, सुख, विद्या, विभूषण और राजप्रीति होती है ॥ १३९ ॥ बुधकी दशामें बृहस्पतिकी अन्तर्दशा हो तो इष्ट-बन्धु-गुरुसे द्वेष, धनलाभ, पुत्र प्राप्ति और रोगादिका भय होता है ॥ १४० ॥ बुधकी दशामें शनिकी अन्तर्दशा हो तो धर्म-सत्कर्म-वित्तकी प्राप्ति, थोड़े जनाधी- शोंसे सुख, कृषी आदिका नाश होता है ॥ १४१ ॥ यदि बुध उच्चराशिका नीचांशकमें हो तो अपनी दशामें कर्ममें विकलता करता है ॥१४२॥ नीच स्थानमें बुध उच्चांशकमें हो तो दशाके आदिमें सब निष्फल हो । और अन्त्यमें शुभ देता है ॥ १४३ ॥ अथ बुधदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् ।

बु. बु.बु. के.बु. शु.बु. सू.बु. चं.बु. मं.बु. रा.बु. बृ.बु. श.योगः
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अथ केतुदशाफलम् ।
दीनो नरो भवति बुद्धिविवेकनष्टो (१) नानाऽऽमयाकुलविवर्द्धितदेहतापः ।
पापादिदृष्टिरतिकष्टचरित्रयुक्तः किञ्चित्सुखी च शिखिनः परिपाककाले ॥ १४४ ॥
श्लोकेनानेन केतुदशाफलमाह । तत्र सामान्यतः केतुदशाफलमशुभमेवोक्तम् । अथ
यदि केतुः शुभग्रहयुतः शुभदृष्टश्च भवेत्तदा तद्दशा शुभफलदाऽपि भवति । एवं पापयुतः
पापद्दष्टश्च केतुरशुभमेव फलं करोति । अस्य केतोर्दशाफलं त्रिधा, 'दशादौ गुरुबन्ध्वार्त्ति,
दशामध्ये धनायतिम्, दशान्ते सुखमिति वाच्यम् । तत्र विशेषः (श्लो. १४४-१५६) द्रष्टव्यः ॥
केतुकी दशामें मनुष्य दीन होता है । बुद्धि विवेकसे हीन होता है । नाना प्रकारके रोगसे
व्याकुल हो देहमें ताप बढ़ता है । पापादिको वृद्धि, अति कष्ट चरित्रसे युक्त और दशाके
परिपाक कालमें थोड़ा सुखी होता है ॥ १४४ ॥
अथ केतुदशायामन्तर्दशाफलानि ।
के. के. - कलत्रपुत्रमरणं सुखवित्तविनाशनम् ।
रिपुभीतिमवाप्नोति केतौ केतुदशान्तरे ॥ १४५ ॥
के. शु. - स्त्रीपुत्ररोगकलहं बन्धुमित्रादिनाशनम् ।
ज्वरातिसारमाप्नोति शुक्रे केतुदशान्तरे ॥ १४६ ॥
के. सू. - मनोभङ्गं शरीरातिं विदेशगमनं भयम् ।
सर्वकार्यविरोधं च रवौ केतुदशान्तरे ॥ १४७ ॥
(१) 'नष्टविवेकबुद्धिः' इति साधुपाठः ।