जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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५५० सटीकजातकपारिजाते- केतु पापग्रहसे युक्त हो तो अपनी दशामें दुष्ट मनुष्यों द्वारा भय, कृत्रिम रोगादि तथा व्यसन और धर्मनाश होता है ॥ १५५ ॥ केतु अपनी दशाके आदिमें गुरु बन्धुको कष्ट देता है, दशाके मध्यमें धन व्यय। दशाके अन्त्यमें सुख देता है। इस प्रकार केतुकी दशाका तीन प्रकार फल है ॥ १५६ ॥ अथ केतुदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् ।
| के. के. | के. शु. | के. सू. | के. चं. | के. मं. | के. रा. | के. बृ. | के. श. | के. बु. | योगः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | १ | ० | ० | ० | १ | ० | १ | ० | ७ |
| ४ | २ | ४ | ७ | ४ | ० | ११ | १ | ११ | ० |
| २७ | ० | ६ | ० | २७ | १८ | ६ | ९ | २७ | ० |
| अथ शुक्रदशाफलम् । | |||||||||
| स्त्रीपुत्रवित्ताप्तिमतीव सौख्यं सुगन्धमाल्याम्बरभूषणाप्तिम् । | |||||||||
| यानादिभाग्यं नरपालतुल्यं यशः स्वपाके भृगुजः करोति ॥१५७॥ | |||||||||
| इदानीं शुक्रदशाफलमाह । सामान्यतः शुक्रदशायां शुभमेव फलमुक्तम् । विशेषार्थं | |||||||||
| ( १५७-१७१ ) श्लोका विचिन्त्याः ॥ १५७ ॥ | |||||||||
| शुक्र अपनी दशामें स्त्री-पुत्र प्राप्ति, अत्यन्त सौख्य, सुगन्ध-माल्य-भूषणकी प्राप्ति | |||||||||
| सवारी आदिका भाग्य, राजाके सदृश और यश वृद्धि करता है ॥ १५७ ॥ | |||||||||
| अथ शुक्रदशायामन्तर्दशाफलानि । | |||||||||
| शु. शु. — शय्यास्त्रीधनवस्त्राप्तिं धर्मादिसुखसम्पदः । | |||||||||
| रिपुनाशं यशोलाभं शुक्रे शुक्रदशान्तरे ॥ १५८ ॥ | |||||||||
| शु. सू. — मूर्धोदराक्षिरोगं च कृषिगोवित्तनाशनम् । | |||||||||
| नृपक्रोधमवाप्नोति रवौ शुक्रदशान्तरे ॥ १५९ ॥ | |||||||||
| शु. चं. — शीतोष्णरोगसन्तापं कामादिरिपुपीडनम् । | |||||||||
| किञ्चित् सुखमवाप्नोति चन्द्रे शुक्रदशान्तरे ॥ १६० ॥ | |||||||||
| शु. मं. — पित्तास्रगक्षिरोगं च चित्तोत्साहं धनागमम् । | |||||||||
| दारमूलाभमाप्नोति कुजे शुक्रदशान्तरे ॥ १६१ ॥ | |||||||||
| शु. रा. — नीलवस्तुधनप्राप्तिं बन्धुद्वेषं सुहृद्भयम् । | |||||||||
| अग्निबाधामवाप्नोति राहौ शुक्रदशान्तरे ॥ १६२ ॥ | |||||||||
| शु. बृ. — धनवस्त्रविभूषाप्तिं धर्माचारं सुखावहम् । | |||||||||
| स्त्रीसुतार्तिं च वैषम्यं गुरौ शुक्रदशान्तरे ॥ १६३ ॥ | |||||||||
| शु. श. — वृद्धस्त्रीजनसम्भोगं गृहक्षेत्रधनागमम् । | |||||||||
| शत्रुनाशमवाप्नोति मन्दे शुक्रदशान्तरे ॥ १६४ ॥ | |||||||||
| शु. बु. — सुतमित्रसुखार्थाप्तिं नृपप्रीतिं महत्सुखम् । | |||||||||
| शुभमारोग्यमाप्नोति बुधे शुक्रदशान्तरे ॥ १६५ ॥ | |||||||||
| शु. के. — कलहं बन्धुनाशं च शत्रुपीडां मनोभयम् । | |||||||||
| धनच्छेदमवाप्नोति केतौ शुक्रदशान्तरे ॥ १६६ ॥ | |||||||||
| विशेषः — उच्चराशि गतः शुक्रो नीचांशकसमन्वितः । | |||||||||
| स्वपाके धननाशं च कुर्वीत पदविच्युतिम् ॥ १६७ ॥ |