भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

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दशाफलाध्यायः ॥१८॥ ५५१ भार्गवो नीचराशिस्थः स्वोच्चांशकसमन्वितः । स्वदाये कृषिवाणिज्यं धनलाभं प्रयच्छति ॥ १६८ ॥ अधुना शुक्रदशायां सर्वेषामन्तर्दशाफलान्याह । तत्र ग्रहाणां स्थितिवलादपि फले न्यूनाधिक्यं विचार्यमिति । श्लोकास्तु सरलार्थ एव ॥ १५८-१६८ ॥ शुक्रकी दशामें शुक्रकी अन्तर्दशा हो तो शय्या-स्त्री-धन-वस्त्रकी प्राप्ति, धन आदि सुख सम्पदा, शत्रुनाश, यश लाभ होता है ॥ १५८ ॥ शुक्रकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा हो तो शिर, उदर और नेत्र रोग, कृषि-गो-धनका नाश और राजाका कोप होता है ॥१५९ ॥ शुक्रकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा हो तो शिरमें गर्मी, सन्ताप, कामचेष्टा शत्रुसे पीड़ा और थोड़ा सुख होता है ॥ १६० ॥ शुक्रकी दशामें मंगलकी अन्तर्दशा हो पित्त-रक्त विकारसे नेत्र रोग, चित्तमें उत्साह, धनका आगम, स्त्री भूमिका लाभ होता है ॥ १६१ ॥ शुक्रकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो नील वस्तु तथा धनकी प्राप्ति, बन्धु वैर, मित्रसे भय और अग्निबाधा होती है ॥ १६२ ॥ शुक्रकी दशामें गुरुकी अन्तर्दशा हो तो धन-वस्त्र-विभूषणकी प्राप्ति, धर्मका आचरण, सुख प्राप्ति, स्त्री पुत्रको कष्ट और विषमता प्राप्त होती है ॥ १६३ ॥ शुक्रकी दशामें शनिकी अन्तर्दशा हो तो वृद्ध स्त्रीसे भोग, क्षेत्र, धन प्राप्त हो और शत्रु का नाश होता है ॥ १६४ ॥ शुक्रकी दशामें बुधकी अन्तर्दशा हो तो पुत्र-मित्र-सुख-धनकी प्राप्ति हो, विशेष सुख हो और शुभ आरोग्यता होती है ॥ १६५ ॥ शुक्रकी दशामें केतुकी अन्तर्दशा हो तो कलह, बन्धुनाश, शत्रु पीडा, मनमें भय और धनका संहार होता है ॥ १६६ ॥ शुक्र उच्च राशिमें नीच नवांशका हो तो अपनी दशामें धनका नाश और पदच्युति करता है ॥ १६७ ॥ नीचराशि में स्थित शुक्र उच्चांशकमें हो तो अपनी दशामें कृषि (खेती) व्यापार और धनका लाभ करता है ॥ १६८ ॥ अथ शुक्रदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् ।

शु. शु.शु. सू.शु. चं.शु. मं.शु. रा.शु. बृ.शु. श.शु. बु.शु. के.योगः
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दशाफले विशेषता-
सम्यग्बलिनः स्वतुङ्गभागे सम्पूर्णा बलवर्जितस्य रिक्ता ।
नीचांशगतस्य शत्रुभागे ज्ञेयाऽनिष्टफला दशा प्रसूतौ ॥ १६६ ॥
तत्तद्भावार्थकामेशदशास्वन्तर्दशासु च ।
तत्तद्भावविनाशः स्यात् तद्युतेक्षितकारकैः ॥ १७० ॥
त्रिकोणधनलाभस्था बलिनो यदि शोभनाः ।
स्वदशान्तर्दशाकाले कुर्वन्ति विपुलं सुखम् ॥ १७१ ॥
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