भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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५४ सटीकजातकापारिजाते- शुक्रः—स्वोच्चे ( मीने ), स्ववर्गे, स्ववारे ( शुकदिने ), राशिमध्ये, लग्नात् ६।१२। ३।४ भावेषु, अपराह्णे = दिनस्य तृतीयत्र्यंशे, तथा ग्रहयुद्धे, चन्द्रसंयुक्ते, वक्रगतौ च सूर्य- स्याग्रतो विद्यमानो यदि भवेत्तदा शोभनः स्यात् । मन्दः = शनिः—तुला-(स्वोच्च-) मकर-कुम्भ (स्वगृह-) राशिषु, लग्नात् सप्तमे भावे ( स्वदिशि ), याम्यायने ( कर्कादिशट्के ), स्वद्रेष्काणे, स्वदिने (शनिवारे ) स्वदशायाम्, समरे = ग्रहयुद्धे राश्यन्ते, तथा यदि कृष्णपक्षे वक्रो भवेत्तदा समस्तभवने- षु = सकलराशिषु बलाधिकः स्यात् । उरगाधिपः = राहुः-मेष-वृश्चिक-कुम्भ-कन्या-वृष-कर्कराशिषु, लग्नाद्दशमे भावे च बलवान् भवति । शिखी = केतुः—कन्या-मीन वृष-धनुराशीषु, रात्रौ, उत्पातकेतुजनने च बली स्यात् । उत्पातकेत्वोर्लक्षणमुक्तं वराहेण— “यः प्रकृतिविपर्यासः प्रायः संक्षेपतः स उत्पातः क्षिति गगनदिव्यजातो यथोत्तरं गुरुतरो भवति” । उत्पातः । “पौर्णिमास्यां तु यदृक्षं तस्मात्पञ्चदशो रविः । रवेर्द्वादशगः केतुः” इति केतुः । अथोक्तेषु ग्रहाणां बलेषु वैशिष्ट्यमाह-ये ग्रहाः प्रोक्तप्रकारबलान्विताः = कथितप्रका- रबलयुक्तास्ते यदि मूलं गताः = भावानामादिगताः स्युस्तदा ते ग्रहा विबलाः = बलहीना भवन्ति । भावादौ स्थिता ग्रहा विबला भवन्ति, तत्र तत्तद्भावस्य निरंशत्वादित्यर्थः । अतस्तेषां ग्रहाणां भावेषु योगेषु दशाफलेषु चोक्तानि फलानि सम्यक् न सन्तीति वाच्यम् ॥ सूर्य-अपने उच्च-राशि, द्रेष्काण, होरा, रविवार, नवांशमें, उत्तरायणमें, दोपहर दिनमें, राशिके आदिमें, मित्रके नवांशादिमें और लग्नसे १० वें भावमें हमेशा बलवान् होता है ॥६१॥ चन्द्रमा—कर्क राशिमें, वृष राशिमें, अपने दिन-द्रेष्काण-होरा-नवांशमें, राशिके अन्तमें शुभ ग्रहोंसे देखे जानेपर, रात्रिमें, चौथे भावमें, दक्षिणायनमें, बली होता है। ऋक्षसन्धिका छोड़ कर हर जगह पूर्ण-बिम्ब और बली चन्द्रमा यदि प्रत्येक ग्रहोंसे देखा जाता हो तो वह चन्द्रमा मनुष्यों का राजयोग करता है । अर्थात् इस योग में जन्म लेने वाला राजा होता है ॥ ६२ ॥ मङ्गल-अपने वारमें, नवमांसमें द्रेष्काण-वर्गमें, मीन-वृश्चिक-कुम्भ-मकर और मेष राशिकी रात्रिमें, वक्रतापर, दक्षिण दिशामें राशिके आदिमें बली है और दशम भावमें कर्क में रहने पर भी सुख देता है ॥ ६३ ॥ बुध-कन्या और मिथुन राशियोंमें, अपने दिनमें, अपने वर्गमें, धनु राशिमें, रविवारके अतिरिक्त दिनरात (सर्वदा) और उत्तरायणमें, बली होता है । यदि राशिके मध्यका होकर लग्नमें प्राप्त हो तो सदा यश और बलकी वृद्धि करता है ॥ ६४ ॥ बृहस्पति-मीन-वृश्चिक-धन और कर्क राशिमें प्राप्त होने पर, अपने वर्ग और वारमें, मध्य दिनमें, उत्तरायणमें, राशिके मध्यमें, कुम्भमें, बली होता है । नीचमें भी यदि लग्न, चतुर्थ और दशम भावमें प्राप्त हो तो बहुत धन देता है ॥ ६५ ॥ शुक्र-उच्चराशि (मीन), अपने वर्ग तथा वारमें, राशिके मध्यमें, षष्ठ-द्वादश-तृतीय और चतुर्थ स्थानमें अपराह्नमें, युद्धके समय, चन्द्रमाके साथ रहने पर और वक्री होनेपर यदि सूर्यके आगे रहे तो शुभ (बली) है ॥ ६६ ॥ शनि-तुला-मकर-और कुम्भ गृहमें, सप्तम भावमें, दक्षिणायनमें, अपने द्रेष्काण तथा अपने दिन (शनिवार) में, दशामें, राशिके अन्त्यमें संग्राममें, बली है और यदि कृष्णपक्ष में वक्री हो तो समस्त राशिमें बलवान् होता है ॥ ६७ ॥ राहु - मेष, वृश्चिक, कुम्भ, कन्या, वृष और कर्क राशि में, दशम स्थानमें बलवान् है । केतु-मीन-वृष तथा धनुमें, रात्रिमें, उत्पातमें, केतु-उदयमें बली है ॥ ६८ ॥