जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवियोनिजन्माध्यायः ॥ ३ ॥ ७३ योनिमें ऐसे गर्भका प्रसव होना असम्भव है, इसलिये आधानमें जो ग्रह बलहीन हो उसके महीनेमें गर्भस्राव कहना चाहिये ॥ २५ ॥ द्विशरीरांशसंयुक्तान् ग्रहान् लग्नं च पश्यति ॥ कन्यांशकगतश्चान्द्रिर्गर्भस्थं त्रितयं वदेत् ॥ २६ ॥ युग्मांशकस्तु कन्यैका द्वौ पुमांसौ च गर्भजाः ॥ युग्मांशगान्त्रिलग्नं च गर्भस्थाः पुरुषास्त्रयः ॥ २७ ॥ कन्यायुग्मांशकोपेतांस्तथा युग्मांशगो बुधः ॥ कन्यानवांशकः सौम्यस्तिस्रो गर्भंगताङ्गनाः ॥ २८ ॥ अत्र २४ श्लोकटीका विलोकया ॥ २६-२८ ॥ कन्या राशिके नवांशमें गत बुध यदि द्विश्वभाव (३।६।९।१२) राशिके नवांशमें प्राप्त ग्रहों और लग्नको देखता हो तो गर्भमें ३ बच्चे, जिनमें २ पुत्री और १ पुत्र हों ॥ २६ ॥ यदि बुध मिथुन नवांशका होकर उन्हें देखे तो एक पुत्री और २ पुत्र गर्भमें कहे । यदि बुध मिथुनांशगत होकर मिथुनांशगत ग्रह और लग्नको देखे तो तीनों पुत्र हों ॥ २७ ॥ कन्या और मिथुननवांशगत ग्रहों तथा लग्नको मिथुनांशगत बुध देखे तो ३ पुत्र, यदि कन्यांशगत बुध देखे तो ३ लड़कियां कहनी चाहिये । (सु० शा० कार) ॥ २८ ॥ द्विस्वभावगतावर्कगुरू बुधनिरिक्षितौ ॥ पुंयुग्मं कुरुतस्तद्वत् शशिशुक्रमहीसुताः ॥ २९ ॥ कुर्वन्ति स्त्रीयुगं तत्र बलाबलविशेषतः ॥ २९½ ॥ अत्र २१ श्लोकव्याख्यावलोकनेन स्पष्टं स्यात् ॥ २९½ ॥ द्विश्वभाव राशिके अंशमें स्थित सूर्य और गुरु यदि बुधसे दृष्ट हों तो दो पुरुषका जन्म कारक होते हैं । एवं चन्द्र, शुक्र और मङ्गल द्वित्वभावमें हों तो दो कन्याकी उत्पत्ति करते हैं। दोनों योगोंकी प्राप्तिमें बलाबल देखकर अधिक बलवालेका पक्ष कहना । (२१ श्लोककी सं० टी० देखिये ॥ २९½ ॥ स्त्रीनपुंसकश्चान्द्रिः पुंनपुंसकदोऽर्कजः ॥ ३० ॥ निषेककाले चन्द्रार्कावन्योन्यं यदि पश्यतः ॥ तथैव चन्द्रमन्दौ वा क्लीबजन्मप्रदौ तथा ॥ ३१ ॥ अनेन क्लीबजन्म निगदितं तदपि २३ श्लोकव्याख्यानान्तर्गतमेव ॥ ३०-३१ ॥ बुध कन्या नपुंसकको उत्पन्न करनेवाला होता है, शनि पुरुष नपुंसक उत्पन्न करने- वाला होता है ॥ ३० ॥ गर्भाधानके समय चन्द्रमा और सूर्य यदि परस्पर देखते हों, इसी प्रकार चंद्र और शनि भी तो नपुंसकको उत्पन्न करते हैं ॥ ३१ ॥ निषेके भ्रातृलग्नेशयोगे यमलसम्भवः । लग्नेशे भ्रातृपक्षस्थे स्वोच्चे वा यमलोद्भवः ॥ ३२ ॥ अत्रापि यमलयोग उच्यते । निषेके=आधानकाले, भ्रातृलग्नेशयोगे—लग्नेशसहजे- शयोर्योगे यमलसंभवो वाच्यः । तथा लग्नेशे भ्रातृपक्षस्थे=तृतीयगते वा स्वोच्चगते यमलो- द्भवो वाच्यः । सर्वार्थचिन्तामणावपि यमलजन्मयोगः— “निषेकलग्नेशतृतीयेनाथौ लग्नस्थितौ चेद्यमलोद्भवः स्यात् । तृतीयनाथेन युतो निषेकलग्नेश्वरस्तत्सहजे तथैव” इति ॥ ३२ ॥ गर्भाधानके समय भ्रातृस्थानेश और लग्नेशका योग हो तो यमल (दो) का जन्म हो । लग्नेश भ्रातृस्थानमें हो, या उच्चस्थानमें हो तो यमल होता है ॥ ३२ ॥ ७ जा०