ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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ज्ञानयोग
अनुराग-घृणा-संघर्षण, उत्तम वा अधम विवेचन,
इस द्वन्द्व भाव को त्यागो, है त्याज्य उभय आलम्बन ।
आदर गुलाम पाये या कोड़ो की मारे खाए,
वह सदा गुलाम रहेगा कालिख का तिलक लगाए;
स्वातन्र्य किसे कहते है—वह जान नही है पाता
स्वाधीन सौख्य जीवन का—उसकी न समझ मे आता
त्यागो संन्यासी, त्यागो तुम द्वन्द्व भाव को सत्वर,
तोडो शृंखल को तोड़ो, गाओ यह गान निरन्तर—
ॐ तत् सत् ॐ
घन अन्धकार हट जाए, मिट जाए घोर महातम,
जो मृगमरीचिका जैसा करता रहता बुद्धि-भ्रम;
मोहक भ्रामक आकर्षण अपनी है चमक दिखाता,
तम से घनतर तम मे वह जीवात्मा को ले जाता ।
जीवन की यह मृग-तृष्णा बढती अनवरत निरन्तर,
मेटो तुम इसे सदा को पीयूष ज्ञान का पीकर ।
यह तम अपनी डोरी मे जीवात्मा-पशु को कसकर
खीचा करता बलपूर्वक दो जन्म-मरण-छोरो पर ।
जिसने अपने को जीता, उसने जय पायी सब पर—
यह तथ्य जान फन्दे मे पड़ना मत बुद्धि गवाँ कर ।
बोलो सन्यासी, बोलो हे वीर्यवान बलशाली,
सानन्द गीत यह गाओ, छेडो यह तान निराली—
ॐ तत् सत् ॐ
“अपने अपने कर्मों का फल भोग जगत् मे निश्चित”
कहते है सब, “कारण पर है सभी कार्य अवलम्बित;