ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यासी का गीत
'फल अशुभ अशुभ कर्मों के, शुभ कर्मों के है शुभ फल,
किसकी सामर्थ्य बदल दे, यह नियम अटल औ' अविचल ?
इस मृत्युलोक मे जो भी करता है तनु को धारण,
बन्धन उसके अंगो का होता नैसर्गिक भूषण ।"
यह सच है, किन्तु परे जो गुण नाम-रूप से रहता
वह नित्य मुक्त आत्मा है, स्वच्छन्द सदैव विचरता ।
'तत् त्वमसि'—वही तो तुम हो, यह ज्ञान करो दृढ्यांकित,
फिर क्या चिन्ता सन्यासी, सानन्द करो उद्घोषित—
ॐ तत् सत् ॐ
क्या मर्म सत्य का, इसको वे कुछ भी समझ न पाते,
सुत बन्धु पिता माता के स्वप्नो मे जो मदमाते ।
आत्मा अतीत नातो से, वह जन्म-मरण से विरहित,
वह लिंग-भेद से ऊपर, सुख-दुख-भावो से अविजित ।
वह पिता कहाँ किसका है, किसका सुत किसकी माता ?
वह शत्रु मित्र किसका है, उसका किससे क्या नाता ?
जो एक, सर्वमय शाश्वत, जिसका जोड़ा न कहीं है,
जिसके अभाव मे कोई सम्भव अस्तित्व नहीं है,
'तत् त्वमसि'—वही तो तुम हो, समझो हे संन्यासीवर,
अतएव उठो, गाओ तुम, गाओ यह गान निरन्तर—
ॐ तत् सत् ॐ
चिर मुक्त विज्ञ आत्मा है, वह अद्वितीय, वह अतुलित,
अक्लेद्य अशोष्य निरामय, वह नाम-रूप-गुण-विरहित,