काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०० ) 'फिर उस महाभयानक तथा अत्यन्त रौद्र रूपवाले प्रदोष काल में कौरव तथा पाण्डव एक साथ अपनी सेनाओं को लौटाकर यथा समय शिविर में जा पहुँचे और विश्राम करने लगे ॥' उक्त उद्धरणों से सिद्ध है कि आठवें दिन का युद्ध कृष्णपक्ष में हुआ । इतना ही नहीं, महाभारत के अनुसार पूर्व दिशा की ओर पाण्डवों का मुख सिद्ध होता है न कि कौरवों का— पश्चिन्मुखाः कुरवो धार्तराष्ट्राः स्थिताः पार्थाः प्राङ्मुखा योत्स्यमानाः । ( भीष्म० २०।४३½ ) 'आपके पुत्र—कौरवों का मुख पश्चिम दिशा की ओर था और कुन्ती के पुत्र उनसे युद्ध करने के लिए पूर्वाभिमुख खड़े थे ॥' महारथौघविपुलः समुद्र इव घोषवान् । भीष्मेण धार्तराष्ट्राणां व्यूहः प्रत्यङ् मुखो युधि ॥ ( भीष्म० २०।१९ ) 'भीष्म द्वारा रचित कौरव सेना का वह व्यूह महारथियों के समुदाय से सम्पन्न हो, समुद्र के समान गर्जना करता था । युद्ध में उसका मुख पश्चिम की ओर था ॥' अभियाय तु दुर्धर्षां धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् । प्राङ् मुख पश्चिमेभागे न्यविशन्त ससैनिकाः ॥ ( भीष्म० १।५ ) 'पाण्डवों के योधा लोग अपने-अपने सैनिकों के सहित धार्तराष्ट्रों की दुर्धर्ष सेना के सम्मुख जाकर पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख होकर ठहर गये थे ।' ते समेत्य यथान्यायं धार्तराष्ट्रा महाबलाः । कुरुक्षेत्रस्य पश्चार्धे व्यपतिष्ठन्त दंशिताः ॥ ( उद्योग० १९५।११ ) 'धृतराष्ट्र के वे महाबली पुत्र रणक्षेत्र में जाकर सुसज्जित हो कुरुक्षेत्र के पश्चिम भाग में यथोचित रूप से खड़े हुए ।' कवीश्वरजी का यह भी कहना गलत है कि शल्याभिषेक के दिन अवकाश अवश्य था । यद्यपि हिमालयन पर ही अभिषेक का उल्लेख है, तथापि लग-