काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९९ ) तन्न मे रोचते युद्धं पाण्डवैर्जितकाशिभिः । घुष्यतामवहारोऽद्य श्वो योत्स्यामः परैः सह ॥ ( भीष्म० ६४।७७ ) 'इसलिए विजय से सुशोभित होने वाले पाण्डवों के साथ इस समय युद्ध करना मुझे पसन्द नहीं आता। आज युद्ध का विराम घोषित कर दिया जाय। कल सबेरे हमलोग शत्रुओं के साथ युद्ध करेंगे ।।' व्युषितायां च शर्वर्यामुदिते च दिवाकरे । उभे सेने महाराज युद्धायैव समीयतुः ॥ ( भीष्म० ६९।१ ) 'महाराज ! वह रात बीतने पर जब सूर्योदय हुआ, तब दोनों ओर की सेनाएँ आमने-सामने आकर युद्ध के लिए डट गयीं ।।' कवीश्वर के मत में मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को आठवें दिनका युद्ध था। कौरव युद्धभूमि में पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े होते थे। इसलिए रात्रि के प्रारंभ में स्वच्छ चन्द्रप्रकाश के सामने से उनके ऊपर आ रहा था और इसलिए उनकी स्वयं की छाया पीछे अनुचरों पर गिरकर अन्धेरा हो गया, वे ठीक प्रकार से नहीं दिखने लगे और छाया भी एक-दो की नहीं, अपितु अगणित हाथी, रथादि से युक्त विशाल सेना की। परन्तु उक्त कल्पना सर्वथा निराधार है। इस न्याय से तो शुक्ल पक्ष की अधिक प्रकाश वाली तिथियों में युद्ध सर्वथा ही असंभव मानना चाहिये । आठवें दिन के अवहार ( युद्ध विराम ) का विवरण महाभारत में इस प्रकार है-- रात्रिः समभवत् तत्र नापश्याम ततोऽनुगान् । ततोऽवहारं सैन्यानां चक्रुः कुरुपाण्डवाः ॥ रजनीमुखे सुरौद्रे तु वर्तमाने महाभये । अवहारं ततः कृत्वा सहिताः कुरुपाण्डवाः । न्यविशन्त यथाकालं गत्वा स्वशिविरं तदा ॥ ( भीष्म० ९६।७९।८० ) 'रात हो गयी थी। हमें अपने सैनिक नहीं दिखाई दे रहे थे, तब कौरव एवं पाण्डवों ने अपनी-अपनी सेना को लौटने का आदेश दे दिया ।।'