काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९८ ) ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत । अस्तं गच्छति सूर्येऽभूत् संध्याकाले च वर्तति ॥ ( भीष्म० ५४।४३ ) 'भारत ! इस प्रकार सूर्यं के अस्ताचल को चले जाने पर संध्या के समय आपकी और पाण्डवों की सेनाएँ लौट आयीं ।।' प्रभातायां च शर्वर्यां भीष्मः शान्तनवस्तदा । अनीकान्यनुसंयाने व्यादिदेशाथ भारत ॥ ( भीष्म० ५६।१ ) 'भारत ! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने अपनी सेनाओं को युद्धभूमि में चलने का आदेश दिया ।।' इति ब्रुवन्तः शिबिराणि जग्मुः सर्वे गणा भारत ये त्वदीयाः ॥ उल्कासहस्रैश्च सुसम्प्रदीप्तैर्विभ्राजमानैश्च यथा प्रदीपैः । किरीटिवित्रासितसर्वयोधा चक्रे निवेशं ध्वजिनी कुरूणाम् ॥ ( भीष्म० ५९।१३८-१३९ ) 'भारत ! उपर्युक्त बातें कहते हुए आपके समस्त सैनिक सहस्रों जलती हुई मसालें तथा प्रकाशमान दीपों के उजाले में अपने-अपने शिबिर में गये । कौरव सेना के सम्पूर्ण सैनिकों पर अर्जुन का त्रास छा रहा था। इसी अवस्था में उस सेना ने रात्रिविश्राम किया ।।' व्युष्टां दिशां भारत भारतानामनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा । ययौ सपत्नान् प्रति जातकोपो वृतः समग्रेण बलेन भीष्मः ॥ ( भीष्म० ६०।१ ) 'भारत ! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब भरतवंशियों की सेना के अग्रभाग में स्थित हुए महामना भीष्म समग्रसेना से घिरकर शत्रुओं से युद्ध करने के लिए चले। उस समय उनके मन में शत्रुओं के प्रति बड़ा क्रोध था ।।' चतुर्थ दिन के युद्ध में भीष्माचार्य के निम्नलिखित वचन से उनके नेतृत्व में अवकाशयुक्त युद्ध का स्पष्ट ही खण्डन होता है— ए