भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ९७ ) गया, त्रिलोकी संत्रस्त हुई । वाहन मल-मूत्र करने और रोने लगे । समुद्र क्षुब्ध हो गये । पृथिवी कांपने लगी । भूत-प्रेतादि नाचने लगे । अथवा जिस समय श्रीकृष्णार्जुन विजय सूचक शुभ शकुनों को अनुभव करते हुए युद्धभूमि में पहुँचे, सूर्योदय का समय उपस्थित हो रहा था । दोनों वीरों ने क्रुद्ध होकर शंख बजाये । उस समय भी अपशकुन प्रकट होने लगे । आकाश से भयंकर गर्जना के साथ सहस्रों जलती हुई उल्काएँ गिरने लगीं और सारी पृथिवी कांपने लगी । 'श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्य- साचिन:' (अर्जुन की प्रतिज्ञा सुन कर) यह लक्षण भी दोनों समय घटित होते हैं । अर्जुन को अत्यन्त प्रसन्न होकर युद्धभूमि में प्रवेश करते देखकर भी सभी उनकी प्रतिज्ञा को जान सकते हैं और रात्रि युद्ध की आशंका से युद्ध के लिये उद्यत होते समय गुप्तचरों से भी पार्थ की प्रतिज्ञा सुनकर सभी त्रस्त हो सकते हैं । युद्धकाल उपस्थित होने पर अपशकुनों का स्पष्ट वर्णन द्रोण० ८४।२५; ८८।४-६ में है । 'सायाह्ने', 'ततो निशाया दिवसस्य चाशिवः शिवारुतैः सन्घिरवर्तताद्भुतः ।, कुशेशयापीडनिभे दिवाकरे विलम्बमानेऽस्तमुपेत्य पर्वताम्, 'प्रियां तनुं भानु- रुपैति पावकम्' (द्रोण० ५०।१-४) 'ततः सन्ध्यामुपास्यैव वीरो वीराव- सादने' (द्रोण० ७२।८) आदि उक्तियों से अर्जुन की प्रतिज्ञा का समय 'सायाह्न सिद्ध होता है । प्रातः काल कदापि नहीं । परन्तु 'तां निशां दुःख शोकार्तौ' (द्रोण० ७७।१) से प्रतिज्ञा वाली रात्रि का पहले संक्षिप्त परिचय देकर 'नर नारायणौ क्रुद्धौ ज्ञात्वा देवाः स वासवाः । श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः' (द्रोण० ७०।२-८) तक युद्धभूमि में श्रीकृष्णार्जुन के प्रयाण का निर्देश कर महाकवि ने अभिमन्युवध वाली रात्रि का विस्तार पूर्वक वर्णन करने की इच्छा से आगे का प्रसंग उपस्थापित करते हुए 'अथ कृष्णं·········' कहा है, ऐसा मानना ही समीचीन है । श्रीभीष्माचार्य के नेतृत्व में रात्रि विश्राम के बाद युद्ध का सर्वत्र उल्लेख भी अवकाश युक्त युद्ध की कल्पना के सर्वथा विरुद्ध ही है-- ७