भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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कवीश्वर युद्ध विराम या अवकाश का स्पष्ट उल्लेख बताते हैं, वह तो युद्ध का ज्वलन्त सन्देश है । यहां ध्यान देने की आवश्यकता है कि 'तां निशां दुःख शोकार्तौ .... ....' ( द्रोण० ७७।१ ) इस वचन से उस रात्रि का संक्षिप्त परिचय मिलता है । आगे सायंकाल से रात्रि भर की घटनाओं का क्रमिक वर्णन है । 'निद्रा नैवो- पलेभाते वासुदेव धनञ्जयौ ।' यह पंक्ति यद्यपि यह सिद्ध करती है कि रात्रि भर श्रीकृष्ण और अर्जुन सोये नहीं, आगे दोनों के शयन का वर्णन मिलता है, अतः पहले श्लोक को ज्यों-का-त्यों प्रमाण मान कर आगे की घटना दूसरे दिन ओर दूसरी रात की है, ऐसा श्रीकवीश्वर सिद्ध करना चाहते हैं । परन्तु वस्तु स्थिति ऐसी नहीं है । यह तो महा कवि की काल सम्बन्धी कूट- शैली है । अतः यहाँ श्रीकृष्णार्जुन के रात्रि भर न सोने में—'देवी सुभद्रा को सान्त्वना प्रदान करने तक' यह संकोचक प्रमाण है। अर्थात् शोक संतप्त होने के कारण श्रीकृष्णार्जुन रात्रि में अधिक समय तक जागे ही रहे । अर्जुन की प्रार्थना पर ( द्रोण० ७७।११ ) जब श्री भगवान् बहन सुभद्रा को सान्त्वना दे चुके, तब दोनों वीर सोये । कवीश्वर का इस सन्दर्भ में यह भी कहना है कि अभिमन्युवध के बाद जयद्रथवध की प्रतिज्ञा वाली रात्रि के पश्चात् अवकाश दिन में सूर्योदय के समय जब श्री कृष्णार्जुन संतप्त थे, तब अनेकों अपशकुन हो रहे थे; जिसका विवेचन द्रोणपर्व ७७।२-८ में विस्तार पूर्वक है । इस पर हमारा यह कहना है कि ग्रन्थकार ने समय निर्धारण के लिये दो संकेत प्रदान किये हैं । 'स कबन्धस्तथाऽऽदित्ये परिधिः समदृश्यत' ( द्रोण० ७७।३ ) इस प्रथम निर्देश से यह निर्णय होता है कि दिन का समय था, रात्रि का नहीं । 'नरनारायणौ क्रुद्धौ ज्ञात्वा देवाः स वासवाः ।' ( द्रोण० ७७।२ ) 'नर नारायण ( अर्जुन और श्रीकृष्ण ) के क्रुद्ध होने ....' इस द्वितीय सन्देश से यह निश्चय होता है कि अभिमन्युवध का समाचार सुनकर भयंकर प्रतिज्ञा कर श्रीकृष्णार्जुन द्वारा क्रुद्ध होकर शंख बजाने के समय सायंकाल था, उसी समय सूर्य कबन्ध ( मस्तकहीन शरीराकृति ) से घिर