काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९५ ) प्रतिज्ञा के अनन्तर ही अर्जुन के गाण्डीव धनुष की टंकार से, श्रीकृष्णार्जुन के दिव्य शङ्खघोष से तथा पाण्डव वीरों के सिंहनाद से संत्रस्त कौरव-गुप्तचरों द्वारा पार्थ की जयद्रथवध सम्बन्धी प्रतिज्ञा सुनने से पूर्व यह समझकर कि अभिमन्युवध के समाचार से क्रुद्ध अर्जुन रात्रि में ही युद्ध के लिए निकल पड़ेंगे, युद्ध की तैयारी करने लगे । ( द्रोणपर्व ७५।६-८ ) इतना ही नहीं, जब संग्राम भूमि से श्रीकृष्णार्जुन शिविर की ओर आ रहे थे तब अभिमन्युवध से प्रसन्न घमण्ड में भरे धृतराष्ट्र के पुत्रों का उन्होंने सिंहनाद सुना । अभिमन्युवध का ज्ञान न होने पर भी पार्थ का हृदय धड़क- धड़क कर विधाता की ओर से उसे किसी अनर्थ की सूचना दे रहा था । इधर युयुत्सु को कौरववीरों की भर्त्सना करते श्रीकृष्ण भगवान् ने सुना । परन्तु उन्होंने अर्जुन को उस समय कुछ नहीं बताया । केवल इतना कहा कि तुम्हारे अपशकुन का फल कोई और ही अमंगल हो सकता है, भाइयों की ओर से निश्चिन्त रहो । बाद में जब अर्जुन ने शिविर में अभिमन्यु को नहीं देखा और सभी भाइयों को अत्यन्त व्यथित देखा तथा श्रीकृष्ण ने भी युयुत्सु द्वारा कौरवों को उपालम्भ ( उलाहना ) का समाचार कह सुनाया, तब अर्जुन ने कहा-- किमर्थमेतन्नाख्यातं त्वया कृष्ण रणे मम ॥ अधाक्षं तानहं क्रूरांस्तदा सर्वान् महारथान् । ( द्रोण० ७२।६४, ६४३ ) "श्रीकृष्ण ! आपने रणक्षेत्र में ही यह बात मुझसे क्यों नहीं बता दी ? मैं उसी समय उन समस्त क्रूर महारथियों को जलाकर भस्म कर डालता ।" उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि जो अर्जुन युद्धभूमि में अभिमन्युवध का समाचार सुन लेते तो शत्रुओं को उसी समय युद्ध में भस्म कर देते तथा जिनके कष्ट और क्रोध का स्मरण कर कौरव रात्रियुद्ध की संभावना से संत्रस्त एवं सतर्क हो गये थे, ऐसी स्थिति में सत्यवादी अर्जुन क्या एक दिन युद्ध को विश्राम देकर निज प्रतिज्ञा भंग कर सकते थे, कदापि नहीं । अतः जिसे प्रो०