काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९४ ) यत् पार्थेन प्रतिज्ञातं तत् तथा न तदन्यथा । चिकीर्षितं हि ते भर्तुर्न भवेज्जातु निष्फलम् ।। यदि च मनुजपन्नगाः पिशाचा रजनिचराः पतगाः सुरासुराश्च । रणगतमभियान्ति सिन्धुराजं न स भविता सह तैरपि प्रभाते ॥ ( द्रोण० ७७।२५, २६ ) 'अर्जुन ने जिस बात के लिए प्रतिज्ञा कर ली है, वह उसी रूप में पूर्ण होगी । उसे कोई पलट नहीं सकता । तुम्हारे स्वामी जो कुछ करना चाहते हैं, वह कभी निष्फल नहीं होता ।।' 'यदि मनुष्य, नाग, पिशाच, निशाचर, पक्षी, देवता और असुर भी रण- क्षेत्र में आये हुए सिन्धुराज जयद्रथ की सहायता के लिए आ जायें तो भी वह कल उन सहायकों के साथ ही जीवन से हाथ धो बैठेगा ।।' वीर अर्जुन की प्रतिज्ञा के अनुरूप ही उसी रात श्री भगवान् का उक्त वचन होना चाहिये, तभी पार्थ की प्रतिज्ञा सत्य सिद्ध होगी । अर्जुन की प्रतिज्ञा से संत्रस्त स्वयं जयद्रथ का वचन भी इसमें प्रमाण है— मामसौ पुत्रहन्तेति श्वोऽभियाता धनञ्जयः । प्रतिज्ञातो हि सेनाया मध्ये तेन वधो मम ॥ तां न देवा न गन्धर्वा नासुरोरगराक्षसाः । उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुं प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ॥ ( द्रोण० ७५।१३, १४ ) 'राजन् मुझे अपने पुत्र का घातक समझकर अर्जुन कल सबेरे मुझपर आक्रमण करने वाला है, क्योंकि उसने अपनी सेना के बीच में मेरे वध की प्रतिज्ञा की है ।।' 'सव्यसाची अर्जुन की उस प्रतिज्ञा को देवता, गन्धर्व, असुर, नाग और राक्षस भी अन्यथा नहीं कर सकते ।।'