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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ९३ ) तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता । तस्य चाह्निभागेन क्षयं जग्मुः पतत्त्रिणः ॥ ( द्रोण० १९१।९ ) अतः अभिमन्युवध के बाद जयद्रथवध से पूर्व अवकाश मानना अर्जुन की अमोघ प्रतिज्ञा को और संजय के उक्त वचन को मिथ्या सिद्ध करना है । जो किसी प्रकार उचित सिद्ध किया ही नहीं जा सकता । अभिमन्युवध जो कि द्रोणाचार्य के नेतृत्व में तेरहवें दिन हुआ, उसके बाद चौदहवें दिन अवकाश इसलिये भी संभव नहीं था, क्योंकि अर्जुन ने रात बीतने के बाद दूसरे ही दिन सूर्यास्त तक जयद्रथवध की घोर प्रतिज्ञा कर ही ली थी— धर्मादपेता ये चान्ये मया नात्रानुकीर्तिताः । ये चानुकीर्तितास्तेषां गतिं क्षिप्रमवाप्नुयाम् ॥ यदि व्युष्टामिमां रात्रिं श्वो न हन्यां जयद्रथम् । इमां चाप्यपरां भूयः प्रतिज्ञां मे निबोधत ॥ यद्यस्मिन्नहते पापे सूर्योऽस्तमुपयास्यति । इहैव सम्प्रवेष्टाऽहं ज्वलितं जातवेदसम् ॥ ( द्रोणपर्व ७३।४५-४७ ) 'ऊपर जिन पापियों का नाम मैंने गिनाया है तथा जिन दूसरे पापियों का नाम नहीं गिनाया है, उनको जो दुर्गति प्राप्त होती है, उसी को शीघ्र ही मैं भी प्राप्त करूँ; यदि यह रात बीतने पर कल जयद्रथ को न मार डालूँ ॥' 'अब आप लोग मेरी यह दूसरी प्रतिज्ञा भी पुनः सुन लें । यदि इस पापी जयद्रथ के मारे जाने से पहले ही सूर्यदेव अस्ताचल को पहुँच जायेंगे तो मैं यहीं प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा ॥' अभिमन्युवध के दिन ही अर्जुन की प्रतिज्ञा मानना और एक दिन युद्ध बन्द रखना, श्रीकृष्णार्जुन दोनों को मिथ्याभाषी सिद्ध करना है । भगवान् श्रीकृष्ण ने उसी रात देवी सुभद्रा से कहा —

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