काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रुतमेतन्मया पूर्वं सर्वमेव तपोधन ॥ विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे। ( शल्य० ५४।२३-२४½ ) “तब रोहिणीनन्दन बलराम ने दीनवाणी में नारदजी से पूछा—'तपो- धन ! जो राजा लोग वहां उपस्थित हुए थे, उन सब क्षत्रियों की क्या अवस्था हुई है, यह सब तो मैंने पहले ही सुन लिया था। इस समय कुछ विशेष और विस्तृत समाचार जानने के लिये मेरे मन में अत्यन्त उत्सुकता हुई है।।” श्री नारदजी के प्रति बलभद्रजी की उक्त उक्तियों से यह भी सिद्ध होता है कि उन्हें युद्ध सम्बन्धी सूचना विश्वस्त व्यक्तियों से प्राप्त होती थी। तथापि किन्हीं-किन्हीं प्राचीन प्रतियों में भी रात्रि विश्राम से पूर्व शल्यवध की सूचना वाला श्लोक नहीं है। अतः उसे क्षेपक माना जा सकता है। देवर्षि द्वारा प्राप्त सूचना शल्यवध के बाद उसी दिन हो सकती है, अतः उसे प्रामा- णिक मानने में कोई आपत्ति नहीं है। अथवा अठारह दिनों तक लगातार युद्ध और ‘पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति’ इस महर्षि वेदव्यास के वाक्य को देखते हुए शल्यवध सम्बन्धी वचन सत्य नहीं माना जा सकता। कदाचित् क्षेपक सिद्ध न भी हो सके तो गौणार्थ की कल्पना इस तरह कर लेनी चाहिये— श्रीकृष्ण प्रेरित धर्मराज ने जब सायंकाल शल्यवध का निश्चय कर लिया, तब धर्म और ब्रह्म को प्रमाण मानने वाले दैवज्ञ ब्राह्मणों की दृष्टि में वह मारा ही जा चुका। जैसे कृष्ण भगवान् से मारे हुओं को ही अर्जुन ने मारा, वैसे ही श्रीभगवान् के अमोघ प्रताप से समन्वित निज संकल्प के प्रभाव से उसी समय मारे ही गये शल्य को ही प्रत्यक्ष युद्ध में धर्मराज ने मारा। इस तरह उन्नीस दिनों तक युद्ध की बात और द्रोणनिधन से दुर्योधन निधन तक अवकाशयुक्त युद्ध की बात निःसार सिद्ध होती है। इसी सन्दर्भ में यह भी समझ लेना चाहिये कि द्रोणाचार्य के नेतृत्व में लगातार युद्ध हुआ—