भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ९१ ) शल्यादि के वध की सूचना तथा भीम-दुर्योधन के गदायुद्ध में दर्शक के रूप में सम्मिलित होने की प्रेरणा मिली । अतः शल्यवध के दूसरे दिन गदायुद्ध में दुर्योधनवध सिद्ध होता है । इसका उत्तर यह है कि यद्यपि निम्नलिखित उक्तियों से रात्रिविश्राम के पूर्व शल्यवध की सूचना सिद्ध होती है— ‘तत्रस्थश्चापि शुश्राव हतं शल्यं हलायुधः । शुश्राव शल्यं संग्रामे निहतं पाण्डवैस्तस्तदा ॥’ ( शल्यपर्व ५२।२६, २७ ) “वहीं रहकर श्रीबलरामजी ने पाण्डवों द्वारा शल्य के मारे जाने का समाचार सुना ॥” और निम्नलिखित वचन से रात्रिविश्राम भी सिद्ध होता है— सम्प्राप्तः कारपवनं प्रवरं तीर्थमुत्तमम् । हलायुधस्तत्र चापि दत्त्वा दानं महाबलः ॥ आप्लुतः सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ । संतर्पयामास पितॄन् देवांश्च रणदुर्मदः ॥ तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्ब्राह्मणैः सह । मित्रावरुणयोः पुण्यं जगामाश्रममच्युतः ॥ ( शल्यपर्व ५४।१२-१४ ) “फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थ में गये । हलधर ने वहां के निर्मल, पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जल में गोता लगाकर ब्राह्मणों को दान दे देवताओं और पितरों का तर्पण किया । तत्पश्चात् रणदुर्मद बलरामजी यतियों और ब्राह्मणों के साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुण के पवित्र आश्रम पर गये ॥” साथ ही— ततोऽब्रवीद् रौहिणेयो नारदं दीनया गिरा ॥ किमवस्थं तु तत् क्षत्रं ये तु तत्राभवन् नृपाः ।'

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