काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९० ) वातिकों से सुनकर जब कृतवर्मा और कृपाचार्य सहित अश्वत्थामा उसी दिन सर्व पाञ्चालों के वध की प्रतिज्ञा कर घोर जंगल में प्रवेश कर गये, तब सूर्यास्त हो रहा था—'सूर्यास्तमनवेलायां' (सौप्तिक० २।१८), 'शर्वरी सम- पद्यत' (सौप्तिक० २४)। अश्वत्थामा ने आधी रात तक सौप्तिक संहार कर दिया—'तस्या रजन्यास्त्वर्धेन' (सौप्तिक ८।३२)। फिर ऊषाकाल में दुर्योधन से मिला। सौप्तिक संहार का समाचार सुनकर सुयोधन ने प्रसन्नता से देह- त्याग किया। दुर्योधन से मिलकर संजय हस्तिनापुर की ओर चला—'प्रत्यूषे काले शोकार्ताः' दुर्योधन के धराशायी होने पर भगवान् श्रीकृष्ण का वचन है— कृतकृत्याश्च सायाह्ने निवासं रोचयामहे । साश्वनागरथाः सर्वे विश्रमामो नराधिपाः ॥ ( शल्यपर्व ६१।६९ ) 'अब हम लोगों का कार्य पूर्ण हो गया, अतः सायंकाल के समय विश्राम करने की इच्छा हो रही है। राजाओं ! हम लोग घोड़े, हाथी एवं रथसहित विश्राम करें।' अतः दुर्योधनवध सूर्यास्त के सन्निकट हुआ। उसी घायल दशा में उसने रात्रि बिताई— दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र शोणितेन परिप्लुतः । तां निशां प्रतिपेदेऽथ सर्वभूतभयावहाम् ॥ ( शल्य० ६५।४५ ) 'राजेन्द्र ! रक्त में सने हुए दुर्योधन ने सम्पूर्ण भूतों के मन में भय उत्पन्न करनेवाली वह रात वहीं व्यतीत की॥' श्रीकवीश्वर का कहना है— शल्यवध की सूचना के बाद श्रीबलभद्रजी ने 'वृद्धा कुमारी कन्या' तीर्थ से चलकर 'प्लक्षप्रस्रवण' और वहाँ से 'कारपवन' नामक उत्तम तीर्थ में जाकर रात्रि विश्राम किया। उसके पश्चात् उन्हें देवर्षि नारद से जयद्रथ, कर्ण एवं